हमारी आँख में तो चूड़ियों के ख़्वाब थे
तुम्हारी आँख में पर दूसरों के ख़्वाब थे
हमें मालूम था ये ज़िंदगी आसाँ नहीं
हमारे नाख़ुनों में ठोकरों के ख़्वाब थे
कड़कती धूप में वो छाँव बन के आती थी
हसीं रातों में उसके गेसुओं के ख़्वाब थे
हमें तो सिर्फ़ वा'दा याद है सो इसलिए
दरों पे बैठते थे दस्तकों के ख़्वाब थे
हमें आता था दरिया से निकलने का हुनर
मगर ये कश्तियों में गर्दिशों के ख़्वाब थे
यही तो इक सहारा था हमारे जीने का
तुम्हारी ज़ुल्फ़ में जो ख़ुश्बुओं के ख़्वाब थे
अगर अगुवाई करते तो कहाँ थी मुश्किलें
मगर साहब के दिल में नफ़रतों के ख़्वाब थे
हमारी क़ीमती चीज़ों में ये दिल था फ़क़त
वगरना और तो सब कौड़ियों के ख़्वाब थे
वो क़ीमत जानते थे मुफ़्लिसी की इसलिए
महल में रह के भी बस रोटियों के ख़्वाब थे
मोहब्बत के दिनों को जो भुला बैठे हैं आज
कभी इन झोलियों में नेकियों के ख़्वाब थे
कभी ऐसे भी दिन गुज़रे हैं उसकी याद में
गुलों को तोड़ते थे हिचकियों के ख़्वाब थे
उन्हें ही क़द्र है बस उन शहीदों की जिन्हें
घरों को लौट कर भी सरहदों के ख़्वाब थे
हुई है कैफ़ियत इक ज़िंदगी में ऐसी भी
बिछड़ते वक़्त भी कुछ राबतों के ख़्वाब थे
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