मैं मुश्त-ए-ख़ाक जो आँधी से बच के चलता हूँ
नज़र चुरा के दरीचों से फिर निकलता हूँ
घरों के बीच में रहता हूँ दर्द की मानिंद
बिछड़ने वालों की तस्वीरों से निकलता हूँ
कभी जो तेरी कमी खलने लगती है मुझको
मैं बे-वजह ही ये कमरों में जा टहलता हूँ
कभी भी ज़िक्र न करियो हसीन लम्हों का
निकलते वक़्त मैं महफ़िल से ख़ूँ उगलता हूँ
As you were reading Shayari by Harsh Kumar Bhatnagar
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