हाँ गिला है अपने वजूद से ये चराग़ भी न जला सका
किसी के लिए मैं रुका रहा उसे राज़-ए-दिल न बता सका
वो है दास्ताँ वो है ज़िंदगी वो बसा है मेरे नफ़स नफ़स
मैं ये सोचता हूँ न जाने क्यूँ वो मुझे न अपना बना सका
कोई तीर दिल में लगा नहीं भले ख़ूँ बहा मिरा जंग में
सो मैं इसलिए मिरी जान-ए-जाँ तुझे दर्द-ए-दिल न बता सका
As you were reading Shayari by Harsh Kumar Bhatnagar
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