दिल दहक उठता है ये शहर की उर्यानी से
इसलिए लोग भी डरते हैं निगहबानी से
वो कभी मुझको पलट कर भी नहीं देखेगा
वो सदा कहता था मुझको ये पशेमानी से
रंग भी उड़ने लगे घर के जुदाई से तिरी
खिड़कियाँ रोने लगी सारी ये वीरानी से
ज़िंदगी ऐसी कि खुल कर के मैं रो सकता नहीं
इसलिए लिखता हूँ ग़ज़लें भी मैं आसानी से
As you were reading Shayari by Harsh Kumar Bhatnagar
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