पहले पंछियों के निकलते हुए पर देखेंगे
बा'द में इन के लिए कोई सफ़र देखेंगे
वाक़िआ'' रोज़ ही बचपन से मैं ये सुन रहा हूँ
वक़्त बदलेगा तो फिर अच्छा सा घर देखेंगे
अब गुज़ारेंगे नहीं दिन किसी की ख़ातिर हम
राह देखेंगे तो बस एक पहर देखेंगे
— Harsh Kumar Bhatnagar















