आज दिल गम-ज़दा है मिरा
दर्द से राब्ता है मिरा
जब से गुज़रा गली से है वो
दिल धड़कने लगा है मिरा
मैं मिलूँगा वहीं पर जहाँ
घर भी सहरा-नुमा है मिरा
जब छुआ उस ने दरवाज़े को
घर महकने लगा है मिरा
देखे पा-बा-हिना उसके जब
घर ये मातम-कदा है मिरा
जब से तू छोड़ कर है गया
दिल भी वहशत-भरा है मिरा
तुझ में ही तो जहाँ दिखता है
तू ही हर्फ़-ए-दुआ है मिरा
रात कट जाती है ग़ज़लों में
दिन में तू आसरा है मिरा
काश मुझको तू देखे कभी
चेहरा हल्का-नुमा है मिरा
As you were reading Shayari by Harsh Kumar Bhatnagar
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