कभी उल्फ़त कभी नफ़रत कभी कुछ वसवसों के साथ
शजर को काटते हैं हम बड़े ही मसअलों के साथ
कभी भी दूर जाना मसअले का हल नहीं होता
मोहब्बत और बढ़ती जाती है इन फ़ासलों के साथ
वगरना मार डालेगी ये सहरा की तपिश तुझको
तुझे भरना पड़ेगा इस घड़े को कंकड़ों के साथ
चराग़ों को बुझाने की कभी कोशिश भी मत करना
वहाँ पे एक बच्चा पढ़ रहा है चाहतों के साथ
As you were reading Shayari by Harsh Kumar Bhatnagar
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