तेरी नज़र के आगे मैं बे-इख़्तियार हूँ
जो भी हूँ जैसा भी हूँ मैं ही तेरा प्यार हूँ
तू माँगता है जिसको तहज्जुद के वक़्त पर
मैं वो ख़ुदा के भेजा हुआ एतिबार हूँ
जो गेसुओं से चल के कमर पे करे है रक़्स
तेरे बदन से गिरता हुआ आबशार हूँ
इक नौकरी की आस में कितने ही मर गए
मैं भी तो मरने के ही लिए बे-क़रार हूँ
मैं वास्ते ग़ुरूर के तुझको भी छोड़ दूँ
तू बात मान मेरी मैं बे-एतिबार हूँ
As you were reading Shayari by Harsh Kumar Bhatnagar
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