मेरी आँखों में अब ख़्वाब आता नहीं
आता तो है मगर मैं बताता नहीं
हो गई ढीठ इक शख़्स के जाने से
अब तो आँखों से रोया भी जाता नहीं
क्या है जो तूने मुझ सेे छिपाए रखा
क्यूँ तू सब कुछ मुझे सच बताता नहीं
हम तो उसके लिए ही ग़ज़ल लिखते हैं
एक वो जो कभी सुनने आता नहीं
उस से मिलता हूँ तो आँखें भर जाती हैं
और चश्मा भी फिर मैं हटाता नहीं
वक़्त रहते सँभल तो गया हूँ मगर
याद आने से वो बाज़ आता नहीं
'हर्ष' की मुस्कुराहट में ग़म दिखता है
इसलिए भी मैं हँस के दिखाता नहीं
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