हर किसी को नहीं होती हैं मुयस्सर ग़ज़लें
चाँद तारों के अलावा भी हैं बेहतर ग़ज़लें
अब कोई ख़्वाब सताता नहीं हम को उस का
नींद आ जाती है अब रात को पढ़ कर ग़ज़लें
अब चराग़ों से कोई काम नहीं लेंगे हम
घर को रौशन किए जाती हैं मुनव्वर ग़ज़लें
ज़िंदगी जीने को छह चीज़ें ही काफ़ी हैं बहुत
इश्क़ घर-बार अना दोस्ती दफ़्तर ग़ज़लें
आप तलवारों से मक़्तल में बहाओगे ख़ून
हम वरक़ फाड़ के फेंकेंगे ये नश्तर ग़ज़लें
हम को आता नहीं रोते हुए ग़ज़लें कहना
हम तो कहते हैं सदा बज़्म में हँस कर ग़ज़लें
चार ग़ज़लों से ही अब काम लिया जाता है दोस्त
यूँ तो रक्खी हैं मिरे पास बहत्तर ग़ज़लें
— Harsh Kumar Bhatnagar















