न जाने किस की वजह से गुमान आ गया है
ज़मीं से लड़ने भी ख़ुद आसमान आ गया है
उदासी में सदा रहना पसंद था मुझको
ये कौन घर में मिरे ख़ुश-ज़बान आ गया है
ये कामयाबी से मेरी भी जल रहे हैं जो
इन्हें बता दो नया नौजवान आ गया है
मैं शे'र कहने लगा हूँ तू ग़ौर से सुनना
मिरी ज़बान में भी ख़ुश-बयान आ गया है
तू अब छिपा भी नहीं सकता इश्क़ को अपने
गले पे हल्का सा तेरे निशान आ गया है
सफ़र पे मेरे किसी ने भी साथ तक न दिया
मगर गिराने को सारा जहान आ गया है
As you were reading Shayari by Harsh Kumar Bhatnagar
our suggestion based on Harsh Kumar Bhatnagar
As you were reading undefined Shayari