ye harf bech ke kharcha to chal nahin saktaa | ये हर्फ़ बेच के ख़र्चा तो चल नहीं सकता

  - Harsh Kumar Bhatnagar

ये हर्फ़ बेच के ख़र्चा तो चल नहीं सकता
हाँ शा'इरी से मगर मैं निकल नहीं सकता

मैं सोचता हूँ दुकाँ पे खड़ा हुआ हर रोज़
मैं रातों रात ये क़िस्मत बदल नहीं सकता

बहुत ज़रूरी है मेहनत से काम करना भी
लकीरें हाथ की कोई बदल नहीं सकता

सड़क पे घूमते बच्चे ने मुझ सेे पूछा है
बग़ैर माँ के कभी क्या मैं पल नहीं सकता

शब-ए-फ़िराक़ ये रस्सी ने है सवाल किया
ख़याल तेरा ये मरने का टल नहीं सकता

  - Harsh Kumar Bhatnagar

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