तुम्हारे बा'द ये दिल गर दुखा नहीं होता

हमारे पाँव में भी आबला नहीं होता

अभी भी वक़्त है तू रोक ले वगरना दोस्त
बिछड़ने वालों से फिर राब्ता नहीं होता

क़लम की नोक से दुनिया भी काँप जाती है
ये दस्तख़त से ज़माने में क्या नहीं होता

ये ज़िंदगी तो फ़क़त चार दिन की है जी ले
वगरना बा'द में कुछ फ़ैसला नहीं होता

अना से लोगों के घर तक बिखरने लगते हैं
तू कहता है कि कोई मसअला नहीं होता

अगर समझने की कोशिश भी करता तू उस वक़्त
तो आज शे'र में भी वसवसा नहीं होता

जो कुछ भी होना है जो कुछ हुआ है लिख रखा है
बिना ख़ुदा के कोई मो'जिज़ा नहीं होता

— Harsh Kumar Bhatnagar

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