
गुल-ए-तर के हैं जैसी ख़ूब-सूरत माँ की आँखें
ग़ज़लकारों की है पहली मोहब्बत माँ की आँखें
ये रंग-ओ-रूप आलीशान सा घर और दौलत
ये सब से और हैं ऊपर की शोहरत माँ की आँखें
— Harsh Kumar Bhatnagar
Other sher from the same pen
Voices in the same orbit
Poetry by feeling