Lokesh Singh

Top 10 of Lokesh Singh

    भूख ने है कर दिया नंगा जिसे
    उस बदन पे कितने छाले चाहिए
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    रेत भर कर आ गया हूँ ज़िस्म में
    अब है मुझमें दरिया पी जाने का फ़न
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    पास बैठे है मिरे कब से वो खामोश बहुत
    अपनी पायल को जो छनकाए तो फिर शेर कहें
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    बढ़ता रहा बदन में मिरे शोर ज़ख़्म का
    मुझसे बदन का बच्चा सँभाला नहीं गया
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    दिल में छुपी जो रह गई थी बात अभी तक
    करती रही अंदर मिरे बरसात अभी तक
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    ढूंढ कर लाओ उसे और जहां में भर दो
    आज दुनिया में फ़रिश्तों की जगह खाली है
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    किसी ने छुआ था मुझे ख़ाब मे कल
    उसी इक छुअन से पिघलने लगे है
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    जिस्म है ज़ख़्म से भरा पूरा
    उम्र भर का हिसाब हो जैसे
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    सताती बहुत है बदन की उदासी
    यहाँ कौन रोता है अपनी ख़ुशी से
    Lokesh Singh
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    ज़िन्दगी में कही कुछ कमी रह गयी
    मेरे होठों पे बस तिश्नगी रह गयी

    इतनें अरमानों का कत्ल हमनें किया
    हर तमन्ना दबी की दबी रह गयी

    दिल झुलसता रहा आतिश-ए-इश्क से
    राह में बेकरां तीरगी रह गयी

    उनकों जाता हुआ देखकर यूं लगा
    नब्ज थम सी गयी और थमी रह गयी

    वो जलाता रहा खत मेरे सामने
    चश्म-ए-पुरनम झुकी की झुकी रह गयी

    याद करते रहें दिल ही दिल में तुझे
    शम्अ बुझ के भी जलती हुई रह गयी

    अब गम ए जिंदगी से मैं बेफिक्र हूँ
    जब कलम पे मेरी शायरी रह गयी
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    Lokesh Singh
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