ज़िंदगी के प्यारे और उसकी ख़ुशी के सात दिन
कुछ अलग ही लगते हैं ना ? फरवरी के सात दिन
शायरी और नौकरी है दोनों ही मेरी ज़रूरत
इक है दिल भरने को और इक पेट भरने के लिए है
उसका चेहरा
सिंपल सादा सा भोला चेहरा है
यार क़सम से वो प्यारा चेहरा है
पेड़ नदी ये फूल सभी छोड़ो
उसको देखो उसका चेहरा है
दुनिया लाख हसीन हो सकती है
लेकिन उसका चेहरा चेहरा है
देख उसे कह डाला हमने भी
बातें प्यारी हैं प्यारा चेहरा है
इक तिल होट पे, गाल के नीचे इक
और वो चांद सा नाक पे नूर लिए
दो प्यारी आंखें, और सुर्ख से लब
प्यार मिलाकर अपना रंगों में
हमने बनाया उसका चेहरा है
भोली सूरत पे वो अकड़ देखो
ग़लती करके घुमाया चेहरा है
रूठ गई जो हमसे कभी वो दोस्त
सबसे पहले चुराया चेहरा है
जब भी उसको चूमने आए हम
होट से पहले आया चेहरा है
मुंह से इक वो स्वाद नहीं जाता
जबसे उसका चूमा चेहरा है
रात का होना उसकी आंखें हैं
दिन का निकलना उसका चेहरा है
दुनिया में है उसके चेहरे से है नूर
रौशनी लाया उसका चेहरा है
हम जैसे भी दरिया करेंगे पार !
अब जो सहारा उसका चेहरा है
हम आबाद रहेंगे ऐसे ही
हम पे गर साया वो चेहरा है
वो चेहरा है बस वो चेहरा है
हमको बस वो चेहरा चेहरा है
हमने चाहा बस वो चेहरा है
हमने मांगा बस वो चेहरा है
हमने देखा भी तो वो चेहरा
हमने सोचा बस वो चेहरा है
मुझको अपने रंग में रंगने की कोशिश तो करो
मैं तेरी ही हूं ये समझने की कोशिश तो करो
मीरा तो पहले से ही कन्हा थी तुम्हारी ही
तुम भी अब मीरा का बनने की कोशिश तो करो
देख ले तूने जो चाहा हो गया
देख ले मुझको मैं तन्हा हो गया
मैं कभी उसका था उसका ही था बस
एक दिन फिर मैं पराया हो गया
तू गई है छोड़ के यादें नहीं
किसने बोला मैं अकेला हो गया
मैं हुआ दरिया कभी सहरा सनम
प्यार में तेरे मैं क्या क्या हो गया
तेरे हक़ की हर ख़ुशी तुझको मिले
अपना तो ग़म था जो अपना हो गया
दर्द बाहर भी चले आयेंगे दोस्त
दोस्त बस तू पूछ ले क्या हो गया
मैं चला था भीड़ के ही साथ, पर
आंख झपकी और मैं तन्हा हो गया
कितना प्यारा वो ख़ुदा को मत ही पूछ
उसने जो चाहा जो बोला हो गया
अपनी है तासीर कुछ ऐसी 'सलीम'
जो मिला हम से वो हम सा हो गया
कॉल कर लूं तुझे, रोज बस मैं यही सोचता हूं
पर करूं भी तो किस हक़ से अब, मैं ये भी सोचता हूं
अंदर ही अंदर मुझ में है, रोता दर्द
दिल से निकलता ही नहीं, मेरे दिल का दर्द
होता गर तुझको भी मेरे जैसा दर्द
तब तू जान ही जाती, आख़िर है क्या दर्द
कोई मेरे आंसू समझे बस इतना
मैं उससे कह देता अपना सारा दर्द
दिल मेरा बरसो पहले टूटा था, पर
इसमें रहता है अब भी कुछ हल्का दर्द
कोई साथ निभाओ हाथ बटाओ मेरा
कब तक ढोते रहूंगा मैं, यू तन्हा दर्द
मुझ पे कुछ तू तरस खा के ही आजा अब
नाम तेरा लेता है, दिल में उठता दर्द
साथ निभाता रहता है हरदम मेरा
हाथ का पैर का और मुझे फिर सर का दर्द
शायद मुझ को कोई बीमारी है ' सलीम '
मुझमें ये डर बैठा है, फिर कोई देगा दर्द
सारे पेड़ क़लम में बना दूं और समंदर रख लूं स्याही
तब भी न लिख पाऊंगा मैं उस पे , ऐसी है मेरी माई
दे चुके हैं, सब मुबारक ईद की मुझको
बोल दे तू भी तो मेरी ईद पूरी हो
रब रखें जोड़े सलामत, सब मुहब्बत के
रब करें पूरी कहानी, जो अधूरी हो
ये दुआ है, चाहता हूँ पूरी हो जाए
ये दुआ है, सीने से मुझको लगा ले वो
जाएंगे फिर हम कहाँ ? हम तेरे अपने हैं
याद कर ले पहले उनको, जो ज़रूरी हो
छोड़ दो गुस्सा मैं माफी माँगता हूँ दोस्त
पर ज़रा तुम भी तो मेरी बात को समझो
इतना तू करता नहीं जितना सुनाता है
वो मदद भी क्या मदद है? जो सुना के दो
जानता हूँ प्यार सच्चा है तेरा, फिर भी
चाहता हूँ ये मुझे लिख कर कहीं दे दो
मैंने सारा दुख 'सलीम' अब भूल जाना है
तुम भी उस लड़की को आने से मना कर दो
इक परी सी प्यारी लड़की सोने की
नर्म हाथों में , अंगूठी सोने की
उसका चेहरा, जैसे चांदी का है, और
उसकी आंखें, जैसे लगती सोने की
आई लव यू, बोल मुझको, फिर तू देख
हाथ पहना दुंगा, चूड़ी सोने की
हम फ़कीरों में गिने जाते है, और
उसके कंगन , उसकी चूड़ी सोने की
नींद आती ही नहीं थी तब मुझे
जब ज़रूरत थी मुझे भी सोने की
उसकी क़ीमत कितनी है ? मत पूछ दोस्त
उसके आगे दुनिया फीकी सोने की
श्याम तो, मीरा न हो पाया तेरा
क्या करेगी अब ये मूर्ति सोने की
वो तेरी हो ही नहीं सकती ' सलीम '
माटी का तू और वो पूरी सोने की