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उस ने बचा के मुझ से नज़र ख़ुद-कुशी की है
मुझ से ही बे-वफ़ाई मिरी ज़िंदगी की है
मुझ से ही बे-वफ़ाई मिरी ज़िंदगी की है
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देनी थी बस ख़याल को इक शक्ल शे'र की
देते हुए ये रात मिरी नींद उड़ गई
देते हुए ये रात मिरी नींद उड़ गई
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पड़े हैं कितने ही मेरे ख़याल कूड़े में
गुनाह ये है कि बे-बहर की हैं सब बातें
गुनाह ये है कि बे-बहर की हैं सब बातें
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इसी वजह से ही रहता हूँ मैं ज़मीं से जुड़ा
मुझे पता है कि अंजाम क्या है गिरने के बा'द
मुझे पता है कि अंजाम क्या है गिरने के बा'द
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Arbab Shaz
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