अश्क पलकों से बहाते जाइए

राज़ आँखों से बताते जाइए

ख़ुद को आईना बनाते जाइए
हम को हम से ही मिलाते जाइए

दोस्ती मुमकिन न हो तो क्या हुआ
दुश्मनी जम कर निभाते जाइए

रात होगी जिस से रौशन शहर की
उन चराग़ों को बुझाते जाइए

हाल-ए-दिल कहना लगे दुश्वार तो
शे'र के ज़रिए सुनाते जाइए

इश्क़ पाकीज़ा मिलेगा आप को
शाइरों को आज़माते जाइए

— Arbab Shaz

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