Ankit Yadav

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    जब उसके अश्क से ये हाथ सनता जा रहा था
    हमारे दरमियाँ कुछ था जो छनता जा रहा था

    ख़ुशी से छोड़ दी फिर एक दिन उसकी गली भी
    मैं उससे मुख़्तलिफ़ हूँ जैसा बनता जा रहा था
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    Ankit Yadav
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    ऐ सखी बे-तहाशा मोहब्बत तिरी मुझको हर रस्म से मावरा थी मगर
    उम्र तन्हा बिताने से अच्छा ये था तुम सफ़र में कोई हम-सफ़र देखते

    ना-मुकम्मल सभी ख़्वाब हैं आज तक फिर भी बस एक दिल की ख़ुशी के लिए
    चश्म-ए-हैराँ से बुनते किसी ख़्वाब को फिर उसी ख़्वाब को रात भर देखते
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    Ankit Yadav
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    इस तरह हम तुम्हारा असर देखते
    ये हसीं लब ये ज़ुल्फ़ें नज़र देखते

    शहर से जब तुम्हारे गुज़रते कभी
    तो तुम्हारी गली ख़ासकर देखते
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    Ankit Yadav
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    पत्थरों से बात करने की अदा मैं जानता हूँ
    बात फूलों से करूँ तो हाथ मेरे काँपते हैं
    Ankit Yadav
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    खोज लूँ मैं तुझे ख़यालों में
    और तुझे भी ख़याल आ जाए
    Ankit Yadav
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    इस तरह झूम के तू चलता है
    जिस तरह कोई माफ़िया जाए
    Ankit Yadav
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    नज़्म: फ़रेब और मैं
    मुझे कभी मिलो तो मेरी बात पे यक़ीं
    नहीं करो तो कोई ग़म नहीं
    मिरी तो उम्र ही फ़रेब और झूठ में कटी
    वही सभी में है बटी
    यही तो बात है बड़े कमाल की
    कि मैंने ये हुनर समंदरों से सीख कर
    दिखा दिया है आज़मा के हर रक़ीब पर
    मिरा यक़ीं करो फ़रेब और धूल
    आँख में अगर पड़े तो चुभते हैं
    वो आँख से चमक चुरा के छोड़ देते हैं
    वो रस्ता मोड़ देते हैं
    दिलों को तोड़ देते हैं
    मैं क्या करूँ पला हूँ मैं
    किसी उजाड़ पेड़ की तपी हुई सी छाँव में
    किसी उजाड़ गाँव में
    वो पेड़ और गाँव जो कि मर गए थे
    एक बूँद नीर की तलाश में
    तुम्हारे जैसे ही किसी हसीन रहनुमा की आस में
    और बता गए मुझे कि
    अपनी ज़िंदगी न इस तरह तबाह कर
    फ़रेब कर के भी अगर निबाह कर सके
    तो फिर निबाह कर
    मैं मुद्दतों से भूख को ज़ेहन में
    लिए हुए तमाम भेड़ियों से दूर भागता रहा
    तमाम रात ज़ख़्म को छुपाए जागता रहा
    वो भेड़िए जो जिस्म नोच खा गए
    भूख फिर भी न मिटी तो हड्डियाँ चबा गए
    उन्हीं से सीख कर के जिस्म नोचने का हुनर
    मैं बस फ़रेब और फ़रेब बन के रह गया
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    Ankit Yadav
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    अगर वो मेरे साथ घर से निकलती
    तमन्ना मचलते मचलते मचलती

    कभी बारिशों में उसे थाम लेता
    अगर वो फिसलते फिसलते फिसलती

    वो शरमा के जब मुझसे नज़रें मिलाती
    मेरी जाँ निकलते निकलते निकलती

    मेरे बाज़ुओं में वो पत्थर की मूरत
    ख़ुशी से पिघलते पिघलते पिघलती

    ये माना है मुश्किल मगर मेरी क़िस्मत
    कभी तो बदलते बदलते बदलती
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    Ankit Yadav
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    उस चाँद को भी रश्क होता था उसी को देख कर
    मैं भी खुले आकाश में तस्वीर उसकी चूमता
    Ankit Yadav
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    मैंने मोहब्बत की कभी तालीम तो ली ही नहीं
    लेकिन दिलों को तोड़ना आसान है मेरे लिए
    Ankit Yadav
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