उस दौर में हम हैं जहाँ अच्छा बुरा कुछ भी नहीं
मैंने कहा कुछ तो कहो उसने कहा कुछ भी नहीं
कुछ ग़म–ज़दों की आस में कुछ ग़म–ज़दे गुम हो गए
मैं रह गया इक ग़म–ज़दा मुझको हुआ कुछ भी नहीं
तुमको भी अब मुझ सेे कोई नाराज़गी शिकवा नहीं
क्या कुछ हमारे दरमियाँ अब है बचा कुछ भी नहीं
उस मोड़ पर मिल भी गईं गर रेल की ये पटरियाँ
तो बच निकलने का बचेगा रास्ता कुछ भी नहीं
हर 'उम्र पर तब्दीलियाँ दोनों ने देखी थी मगर
तस्वीर है सब कुछ यहाँ अब आइना कुछ भी नहीं
Read Full