नज़्म: फ़रेब और मैं
मुझे कभी मिलो तो मेरी बात पे यक़ीं
नहीं करो तो कोई ग़म नहीं
मिरी तो उम्र ही फ़रेब और झूठ में कटी
वही सभी में है बटी
यही तो बात है बड़े कमाल की
कि मैं ने ये हुनर समंदरों से सीख कर
दिखा दिया है आज़मा के हर रक़ीब पर
मिरा यक़ीं करो फ़रेब और धूल
आँख में अगर पड़े तो चुभते हैं
वो आँख से चमक चुरा के छोड़ देते हैं
वो रस्ता मोड़ देते हैं
दिलों को तोड़ देते हैं
मैं क्या करूँ पला हूँ मैं
किसी उजाड़ पेड़ की तपी हुई सी छाँव में
किसी उजाड़ गाँव में
वो पेड़ और गाँव जो कि मर गए थे
एक बूँद नीर की तलाश में
तुम्हारे जैसे ही किसी हसीन रहनुमा की आस में
और बता गए मुझे कि
अपनी ज़िंदगी न इस तरह तबाह कर
फ़रेब कर के भी अगर निबाह कर सके
तो फिर निबाह कर
मैं मुद्दतों से भूख को ज़ेहन में
लिए हुए तमाम भेड़ियों से दूर भागता रहा
तमाम रात ज़ख़्म को छुपाए जागता रहा
वो भेड़िए जो जिस्म नोच खा गए
भूख फिर भी न मिटी तो हड्डियाँ चबा गए
उन्हीं से सीख कर के जिस्म नोचने का हुनर
मैं बस फ़रेब और फ़रेब बन के रह गया















