इस दर्ज़ा उस के साँचे में ढालूँगा ख़ुद को मैं
फिर और कोई शख़्स बना लूँगा ख़ुद को मैं
उलझा रहा हूँ तुझ से बिछड़ने की बात पर
ख़ुद से बिछड़ के कैसे सँभालूँगा ख़ुद को मैं
उस ने ही रख दिए हैं जलाने के सब सबब
अब क्या किसी से आग लगा लूँगा ख़ुद को मैं
ख़्वाबों में वो मिला तो ये एहसास हो गया
जागा रहूँगा अब भी तो पा लूँगा ख़ुद को मैं
— Ankit Yadav















