मिरी ये ज़िंदगी हद से ज़ियादा क्या होगी
बहुत ज़ियादा भी होगी तो बस फ़ना होगी
बहुत ज़ियादा भी होगी तो बस फ़ना होगी
किसी कम अक्ल का क़लमा भी होगा इक बकवास
किसी ज़हीन की गाली भी फ़लसफ़ा होगी
भुगत रहा हूँ सज़ा माज़ी की मैं बन कर ख़ार
और आज ख़ार हूँ कल इस की भी सज़ा होगी
तुम्हारे बा'द मुझे मौत से भी क्या होगा
तुम्हारे बा'द मिरी ज़िंदगी भी क्या होगी
मिरे ज़हान में आने का क्या सबब है शम्स
मिरे जहान से जाने की वज्ह क्या होगी
8
0 Likes
एक धोका है ख़ुश नहीं हूँ मैं
कौन कहता है ख़ुश नहीं हूँ मैं
कौन कहता है ख़ुश नहीं हूँ मैं
एक रिश्ता बचाना है जिस
में
वो भी तन्हा है ख़ुश नहीं हूँ मैं
क्या सबब है कि सिर्फ़ मेरे ब-जुज़
सब को लगता है ख़ुश नहीं हूँ मैं
ख़ुश-मिज़ाजी में शा'इरी कैसी
फिर तो अच्छा है ख़ुश नहीं हूँ मैं
क्या सितम है कि तुम को पा कर भी
ऐसा लगता है ख़ुश नहीं हूँ मैं
यार ऐसे हैं क्या कहूँ तुम से
यार ऐसा है ख़ुश नहीं हूँ मैं
7
0 Likes
मेरे हम साए को मुझ से जी चुराना आ गया
जब मैं उस के सामने जैसा था वैसा आ गया
जब मैं उस के सामने जैसा था वैसा आ गया
मुत्मइन था पूरे घर में रौशनी भर दूँगा आज
पहला दीया ही जला और ख़ुद का साया आ गया
फिर बताऊँगा सभी को सर झुकाने का हुनर
पहले ख़ुद हैरान हो लूँ ये मुझे क्या आ गया
छूने की ज़िद में उसे महसूस कर पाया नहीं
प्यास ही ले कर गया था और प्यासा आ गया
क्या अँधेरा मिट गया सबने फ़क़त पूछा यही
कब किसी को थी तसल्ली दीप ज़िंदा आ गया
6
0 Likes
इतना ग़म था कि मिरी ओर से रोया अंबर
हो गए अब्र तिरे हिज्र में जल के आँसू
वो कोई लाल सियाही नहीं है ख़त में सनम
अबकी आँखों से गिरे रंग बदल के आँसू
हर घड़ी सफ़्हे के आरिज़ पे नमी रहती है
यूँ तिरी याद में गिरते हैं ग़ज़ल के आँसू
दिल ने फिर मारा तमाचा मिरी मजबूरी को
फिर तिरा ज़िक्र चला आँख से छलके आँसू
फिर ख़याल आया है तुम से है बिछड़ना इक दिन
फिर चले आए हैं आँखों में टहल के आँसू
अब की बारिश में कोई तुझ से भी तन्हा था शम्स
रोके रुकते नहीं थे अब की फ़सल के आँसू
4
0 Likes
इक वो हम से जो बिछड़ कर कभी तन्हा न लगे
और इक हम के कभी फिर से शगुफ़्ता न लगे
और इक हम के कभी फिर से शगुफ़्ता न लगे
आह उस शब की सहर जिस
में बिछड़ना था हमें
हम तिरे साथ कभी पहले यूँ तन्हा न लगे
सिर्फ़ उसे बे-वफ़ा लिख दूँ ये ख़याल आया था
फिर ये सोचा कहीं इस दिल को ही अच्छा न लगे
इतना ख़ुश भी नहीं ये दिल के भुला दे तुझ को
पर यूँ ग़म में भी नहीं है कि दोबारा न लगे
उफ़ के इस नूर भरे चेहरे पे काजल तौबा
चाँद उतर आए तो भी आप के जैसा न लगे
बे-वफ़ाई की भी तरतीब सिखा दी उस ने
दिल भी इस तरह से तोड़ा कि शिकस्ता न लगे
1
0 Likes










