तेरी नाज़ुकी बदन की कोई पंखुड़ी हो जैसे
तू महक रही है ऐसे कली संदली हो जैसे
तू महक रही है ऐसे कली संदली हो जैसे
तू जो मुझ से रूठ जाए तो लगे है मुझ को ऐसे
मेरी ज़िंदगी में आई कोई खलबली हो जैसे
तेरी याद की कफ़स से कभी जो निकलना चाहा
मैं समाता जाऊँ इस
में ज़मीं दलदली हो जैसे
तू जो साथ मेरे थी तो थी अमीरी साथ मेरे
तुझे खो के यूँ लगा है मिली मुफ़्लिसी हो जैसे
तेरा रूप है सलोना तेरा हुश्न है क़यामत
तेरे होंठ शबनमी हैं नई ताज़गी हो जैसे
मैं नहीं ये चाहता हूँ तुझे और कोई चाहे
तुझे चाहता हूँ ऐसे कोई मतलबी हो जैसे
तेरी ओर खींचता है मुझे जाने कैसा जादू
तुझे पूजता 'मलक' यूँ कोई बंदगी हो जैसे
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तेरे ही जैसे यार तो, इंसान मैं भी हूँ
इस ज़िन्दगी के ग़म से, परेशान मैं भी हूँ
इस ज़िन्दगी के ग़म से, परेशान मैं भी हूँ
रिश्ते जो पहले ख़ून के थे ग़ैर हो गए
अपने ही घर में आज तो, मेहमान मैं भी हूँ
तन्हाइयों का रोना न रोया करो ऐ दश्त
दुनिया के भीड़ भाड़ में, वीरान मैं भी हूँ
कहता था उम्र भर कभी बदलेंगे हम नहीं
वो आज क्यूँ बदल गया, हैरान मैं भी हूँ
नज़रे करम हो मुझ पे भी फ़ुर्सत मिले अगर
तेरी हसीन आँखों पे क़ुर्बान मैं भी हूँ
ऐसा नहीं के तुम ही, जले हो जुदाई में
तुझ से “मलक” बिछड़ के तो, बे-जान मैं भी हूँ
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इश्क़ की बातों में जो आ बैठा
उस को अपना ख़ुदा बना बैठा
उस को अपना ख़ुदा बना बैठा
मेरा किरदार ही रहा ऐसा
हँसते चेहरों को मैं रुला बैठा
कर के साज़िश मेरी तबाही की
रोने वालों की सफ़ में जा बैठा
क़त्ल होना है लाज़िमी उस का
मजहब -ए- इश्क़ जो बना बैठा
चाँद रातों का उस की क्या डूबा
मेरा दीपक तलक बुझा बैठा।
थी नसीहत मेरे बुजुर्गों की
दुश्मनों को गले लगा बैठा
ज़िन्दगी थी लिखी जहाँ उस की
जान अपनी वहीं गँवा बैठा
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ग़ैरों के हिस्से ख़्वाब यहाँ कौन रखता है
नाज़ुक से दिल में ताब यहाँ कौन रखता है
नाज़ुक से दिल में ताब यहाँ कौन रखता है
हर शख़्स अपने होंठों पे रखता सवाल हैं
लब पे कोई जबाब यहाँ कौन रखता है
हर शक्ल में छुपी है कई शक्ल देखिए
शक्लों पे अब हिज़ाब यहाँ कौन रखता है
दौलत कमाने की यहाँ इक होड़ सी लगी
अच्छा बुरा हिसाब यहाँ कौन रखता है
दिल जान से वो चाहता, ये है ख़बर मुझे
कम ज़्यादा का हिसाब यहाँ कौन रखता है
आँखों सा अब सुरूर कहाँ मय-कदे में है
इतनी भली शराब यहाँ कौन रखता है
मेरी बुराई ही नहीं अच्छाई भी तू देख
बिन काँटों के गुलाब यहाँ कौन रखता है
अब इश्क़ भी कहीं नहीं लैला सा क़ैस सा
अब प्यार बे-हिसाब यहाँ कौन रखता है
हर शय में तो छुपे हैं “मलक” राज़ क्या करें
ख़ुद को खुली किताब यहाँ कौन रखता है
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रेल पटरी ज़हर या फिर फाँसी का फंदा चुनूँ
कश्मकश में डालता है ख़ुद-कुशी का मसअला
प्यार में जो ग़म मिला हैरानगी की बात क्या
हम ने देखा प्यार में है ये सभी का मसअला
मसअला कोई भी हो अक्सर बिखर जाते हैं लोग
मुझ को शोहरत दे रहा है शा'इरी का मसअला
मुफ़्लिसी की बात तो करते सियासी लोग पर
हल नहीं होता कभी भी मुफ़्लिसी का मसअला
आँख उस की ज़ुल्फ़ उस की बात उस की मय ही मय
दूर होता ही नहीं है मयकशी का मसअला
यूँ 'मलक' दिल भी मिले हैं रूह से हम एक हैं
पर नुज़ूमी कह रहा है कुंडली का मसअला
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वो आबसार के जैसा बहेगा आँखों से
जो क़तरा आँख में हम ने सँभाल रक्खा है
इसे अकेले में पलकों से चूम के पढ़ना
कि ख़त में हम ने कलेजा निकाल रक्खा है
ये मसअला तो किसी हाल हल नहीं होगा
जवाब में जो ये तुम ने सवाल रक्खा है
कढ़ाई कर के मेरा नाम जिस पे लिक्खा था
वही रुमाल अभी तक सँभाल रक्खा है
मुझे तो मार ही डाले "मलक" ये तन्हाई
तुम्हारी याद ने मेरा ख़याल रक्खा है
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साल सोलह का वो यौवन जब चढ़ा पहली दफ़ा
देख के शर्मा गया था आइना पहली दफ़ा
देख के शर्मा गया था आइना पहली दफ़ा
फिर कभी मंज़र न गुज़रा आज तक वैसा कभी
वो तेरे हाथों को मेरा चूमना पहली दफ़ा
तुम को है मुझ से मुहब्बत राज़ ज़ाहिर कर गया
वो तुम्हारा मुड़ के मुझ को देखना पहली दफ़ा
शायराना हो गए अल्फ़ाज़ मिल के आप से
मैं भी शाइ'र बन गया जब ख़त लिखा पहली दफ़ा
आप से मिल कर हुई रंगीन मेरी ज़िंदगी
सारे मौसम से हुआ है वास्ता पहली दफ़ा
बज़्म में तन्हाई हो तन्हाई में महफ़िल लगे
प्यार में ये हाल मेरा हो गया पहली दफ़ा
आप से पहले मलक आए गए कितने हसीं
आप से ही है जुड़ा ये दिल मेरा पहली दफ़ा
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गली से गुज़रा तो देखी है अधखुली खिड़की
उदास आँखों से मुझ को निहारती खिड़की
उदास आँखों से मुझ को निहारती खिड़की
कभी जो खिड़की से राहों को मेरी तकता था
उसी की राह को अब जैसे देखती खिड़की
उसी जगह पे कभी एक चाँद रहता था
बनी हुई सी है अब वो अमावसी खिड़की
बुझी बुझी सी लगे,खोई खोई रहती है
किसे सुनाती भला अपनी बेबसी खिड़की
पलट के देख ले इक बार रूठने वाले
के बारहा ये सदाएँ लगा रही खिड़की
हवा थी तेज़ सो खिड़की को बंद करना पड़ा
घुटन हुई ज़रा सी याद आ गई खिड़की
खुला था दर तेरा खिड़की खुली भी रहती थी
कि अब तो भूले से खुलती नहीं कभी खिड़की
वो जिस को देख के सीने में जान आती थी
हमारी जान की दुश्मन "मलक" बनी खिड़की
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ऐसे तुम्हें भुलाने की कोशिश करेंगे हम
ख़त को समय की बज़्म में आतिश करेंगे हम
ख़त को समय की बज़्म में आतिश करेंगे हम
ये और बात है के क़मर आएगा नहीं
हुजरे में अपने लाने की ख़्वाहिश करेंगे हम
जाइज़ सभी है हम ने सुना जंग इश्क़ में
हर हाल तुझ को पाने की साज़िश करेंगे हम
कहता रहे ज़माना मुहब्बत गुनाह है
सौ बार ये हसीन सी लग्ज़िश करेंगे हम
मर मर के जब है जीना तो ऐ ज़िंदगी तू सुन
अच्छा है फिर कज़ा से गुज़ारिश करेंगे हम
बंजर से मेरे दिल में तू बन के बहार आ
राहों में तेरे फूलों की बारिश करेंगे हम
हम भी थे कशमकश में “मलक” कह नहीं सके
वो सोचते थे पहले कि जुम्बिश करेंगे हम
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यूँ मुहब्बत को निभाने का हुनर रखता हूँ
ज़मीं पे आसमाँ लाने का हुनर रखता हूँ
ज़मीं पे आसमाँ लाने का हुनर रखता हूँ
मुंतज़िर हूँ मेरे जैसा ही तू चाहे वरना
तुझ को हर हाल में पाने का हुनर रखता हूँ
थोड़ी शिद्दत से पुकारो मुझे सहरा वालों
दरिया हूँ प्यास बुझाने का हुनर रखता हूँ
इतना आसाँ नहीं किरदार समझना मेरा
हँस के हर ग़म को छुपाने का हुनर रखता हूँ
हम ने सीखा ही नहीं अपनों से नफ़रत वरना
ख़ाक में तुझ को मिलाने का हुनर रखता हूँ
कभी तो अपने लबों पे ज़रा सी जुम्बिश ला
तेरा हर दर्द मिटाने का हुनर रखता हूँ
रूठ कर जा रहे हो शौक़ से जाओ लेकिन
एक रूठे को मनाने का हुनर रखता हूँ
ऐ मलक देख कभी माँग के तू दिल मेरा
इश्क़ में जान लुटाने का हुनर रखता हूँ
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