तुम को कितना ज़्यादा याद किया है मैंने
    मिल कर देखो आँखें कितनी लाल हुई हैं

    Bhoomi Srivastava
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    तेरी तासीर से कुछ मेल खा जाए इसी ख़ातिर
    मैं तोहफ़े में गुलाबों से सजा गुलदान लाई हूँ

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    जो इतनी ख़ूबसूरत लग रही हो तुम
    किसी पत्थर को पिघला के ही मानोगी

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    तमन्ना है दिवाली में दिया इक जल उठे ऐसा
    जला दे फ़ासले सारे हमारे दरमियाँ जो हैं

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    कुछ बेटियाँ बिन बाप के भी काटती हैं ज़िंदगी
    कुछ बेटियों के सिर पे दोनों हाथ माँ के होते हैं

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    ठीक है बात मत करो लेकिन
    इक नज़र हमको देखते जाओ

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    गाड़ी केतन मोटर ज़ेवर सब कैसे ले लें साहब
    हम मज़दूरी करते हैं पहले बच्चों को पालेंगे

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    ईदी में तुम हम को बस खुद को दे दो
    फिर बरसों तक चाहे ईदी मत देना

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    बहुत कुछ हुआ फिर भी रोई नहीं मैं
    नहीं तो वफ़ा टूटे पर कौन हँसता

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    मैंने चाहा भी तो इक ऐसे मनमौजी लड़के को
    जो मरता है अक्सर लाखों फूलों के आकारों पे

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