ये शीशे में नज़र आती अगर सूरत तुम्हारी है
ज़रा इसको सँवारो तुम कि ये ताक़त तुम्हारी है
जहाँ में कौन ऐसा है जिसे दुश्मन से उल्फ़त हो
तुम्हीं ऐसी सियानी हो यही फितरत तुम्हारी है
कभी तो रू-ब-रू ख़ुद से हो फ़ुर्सत में शफ़क़ज़ादी
कि जो तुम में मुरव्वत है ग़ज़ब आदत तुम्हारी है
गले से आ रही आवाज़ को तुमने दबाया क्यूँ
हमें मालूम है कुछ बोलना हसरत तुम्हारी है
ख़बर है क्या तुम्हें तुम हो किसी तावीज़ के जैसी
मिली जो ख़ैरियत सबको फ़क़त रहमत तुम्हारी है
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