Shaikh Sohail

Top 10 of Shaikh Sohail

    अपनी रुस्वाई छुपाऊँगा चला जाऊँगा
    आँख में अश्क न लाऊँगा चला जाऊँगा
    Shaikh Sohail
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    घर की इस बार मुकम्मल मैं तलाशी लूँगा
    तेरी तस्वीर जलाऊँगा चला जाऊँगा
    Shaikh Sohail
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    दिल को मेरे ख़ुदा अभी ताब-ए-सुख़न नहीं
    लिखने चला हूँ वस्फ़-ए-रूख़-ए-यार देख कर
    Shaikh Sohail
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    तस्वीर-ए-यार है इसे रखना सँभाल कर
    इक बार खो गई तो दोबारा न दूँगा मैं
    Shaikh Sohail
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    शरारत नज़ाकत मलाहत अदाएँ
    तिरे हुस्न में हम ने क्या क्या न देखा
    Shaikh Sohail
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    मतलब ही कुछ नहीं कि मुआ'फ़ी करे क़ुबूल
    दिल तोड़ने से पहले तुम्हें सोचना तो था
    Shaikh Sohail
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    करवट बदल बदल कर सोचूँ तुम्हें मैं शब भर
    तुम चैन से किसी के ख़्वाबों को बुन रहे हो
    Shaikh Sohail
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    जलता नहीं हूँ आतिश-ए-रुख़सार देख कर
    करता हूँ नाज़ ताक़त-ए-दीदार देख कर
    Shaikh Sohail
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    "मुझे लगता है कि तुम हो"
    कहीं पे चाँद आ चमके
    मुझे लगता है कि तुम हो
    कहीं पे तारे जब दमके
    मुझे लगता है कि तुम हो

    कहीं बारिश की घटा हो
    कहीं गुम-सुम सी फ़ज़ा हो
    कहीं आँखों का मिलन हो
    कहीं रुख़सार की वाह हो
    कोई फ़ुर्क़त से मिला हो
    वो नज़र कैसी हो क्या हो
    मुझे लगता है कि तुम हो

    मेरे आँगन के किनारे
    कहीं एक फूल जब महके
    मेरी हर रात जिस की याद
    में आरज़ू कह के
    कहीं हो ख़ुर सा रौशन
    कहीं वो अक्स-ए-हिना हो
    मुझे लगता है कि तुम हो

    तुम्हारें नाम का हमनाम
    कहीं कुछ देर ठहरा हो
    तुम्हारी तरह कोई शख़्स
    किसी कोने में बैठा हो
    कहीं आँखों में पानी हो
    कहीं दरिया भी सूखा हो
    कहीं फूलों के गुलशन में
    कोई चिड़िया सा चहका हो
    किसी गुम-नाम से रस्ते
    कोई आवाज़ बुलवाएँ
    किसी दोशीज़ा की ख़ुशबू
    मुलाक़ात मुझ से करवाएँ
    किसी शब में किसी दिन के
    तअल्लुक़ मुझ से हो जाए
    कहीं दिलकश लबों से
    फिर कोई दो बात सुलझाएँ
    कहीं आँचल में हो पहलू
    कहीं पैरों में पायल हो
    मुझे लगता है कि तुम हो

    कहाँ ये बात तुम से हो
    कहाँ ये रात तुम से हो
    कहाँ सोहेल भी चाहे
    कि मुलाक़ात तुम से हो

    कहाँ हो सोहेल की नज़्में
    कहाँ है उन का माह-चेहरा
    कि जैसे एक तिल बैठा
    दिए रुख़सार पर पहरा
    करम हो 'सोहेल' ख़स्ता पर
    कि मैं हूँ अदना सा शाइ'र
    मगर जब शे'र सुन कर
    कोई मुझ पर, दाद देता हो
    मुझे लगता है कि तुम हो
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    Shaikh Sohail
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    अपना हसीन चेहरा दिखाओ ना तुम कभी
    ओ दिल फ़रेब दिल को लगाओ ना तुम कभी

    पर्दा नशीली आँखों को जो देखते हैं हम
    वो रुख़ से अपने पर्दा हटाओ ना तुम कभी

    मेरी निगाह-ए-इश्क़ की हसरत है बस यही
    अपनी निगाह-ए-नाज़ लूटाओ ना तुम कभी

    तुम गुलसिताँ में एक कली की बहार हो
    मेरे चमन में फूल को खिलाओ ना तुम कभी

    गुल-हाए-रंग-रंग मिले तुम को देख कर
    दिल हाए संग संग मिलाओ ना तुम कभी

    एजाज़-ए-शायरी कहो अपनी ज़बान से
    ख़स्ता सोहैल शे'र सुनाओ ना तुम कभी
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    Shaikh Sohail
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