Shaikh Sohail

Shaikh Sohail

@sohailshaikh

'Shaikh Sohail' shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in 'Shaikh Sohail''s shayari and don't forget to save your favorite ones.

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Sher

बिखर चुका हूँ मगर मुस्करा के मिलता हूँ ये रख रखाव अभी मेरे दस्तरस में है — Shaikh Sohail
घर की इस बार मुकम्मल मैं तलाशी लूँगा तेरी तस्वीर जलाऊँगा चला जाऊँगा — Shaikh Sohail
दिल को मेरे ख़ुदा अभी ताब-ए-सुख़न नहीं लिखने चला हूँ वस्फ़-ए-रूख़-ए-यार देख कर — Shaikh Sohail
शरारत नज़ाकत मलाहत अदाएँ तिरे हुस्न में हम ने क्या क्या न देखा — Shaikh Sohail
करवट बदल बदल कर सोचूँ तुम्हें मैं शब भर तुम चैन से किसी के ख़्वाबों को बुन रहे हो — Shaikh Sohail
जो एक शख़्स मुझे छोड़ कर गया है ना वो एक शख़्स से दिल के हज़ार रिश्ते थे — Shaikh Sohail
ईद आई वो न आए क्यूँँ कहूँ ये ईद हो ईद के दिन भी न गर उन की मुयस्सर दीद हो — Shaikh Sohail
जलता नहीं हूँ आतिश-ए-रुख़सार देख कर करता हूँ नाज़ ताक़त-ए-दीदार देख कर — Shaikh Sohail
अपनी रुस्वाई छुपाऊँगा चला जाऊँगा आँख में अश्क न लाऊँगा चला जाऊँगा — Shaikh Sohail
मैं देखूँ रोज़-ओ-शब बस तुम को जानाँ मसअला क्या है तुम इतनी ख़ूब-सूरत हो तुम्हारे साथ रहना है — Shaikh Sohail
तस्वीर-ए-यार है इसे रखना सँभाल कर इक बार खो गई तो दोबारा न दूँगा मैं — Shaikh Sohail
मतलब ही कुछ नहीं कि मुआ'फ़ी करे क़ुबूल दिल तोड़ने से पहले तुम्हें सोचना तो था — Shaikh Sohail
मेरे पिंदार-ए-मोहब्बत का तकाज़ा ये है तुझ को चाहा भी तो औक़ात से बढ़ कर चाहा — Shaikh Sohail
अब तक मिला नहीं है कहाँ है सुकून ए दिल ख़ुद को मैं खो दिया हूँ इसे ढूँढ़ते हुए — Shaikh Sohail
मुझे पाना है गर तुझ को तो मिन्नत कर दुआएँ कर कि मैं वो हूँ नहीं जो भीख में मिल जाऊँगा तुझ को — Shaikh Sohail
एजाज़-ए-शायरी कहो अपनी ज़बान से ख़स्ता सोहेल शे'र सुनाओ न तुम कभी — Shaikh Sohail

Ghazal

तेग़-ए-क़लम चला फ़क्त अश'आर के लिए सैफ़-ए-ज़बाँ ख़मोश रही यार के लिए ताब-ए-सुख़न नहीं है कुछ अनवार के लिए लिखने चला हूँ वस्फ़-ए-रुख़-ए-यार के लिए तस्लीम-ए-जुर्म करता हूँ इज़हार के लिए अफ़सुर्दा हो गया हूँ बस इक प्यार के लिए मैं इक सवाल कर के परेशान हो गया सारे जवाब देने लगे यार के लिए असबाब-ए-रंज-ओ-'ऐश हमें कुछ पता नहीं कहते हैं लोग मरते हैं हम यार के लिए बाग़-ओ-बहार ख़रमी-ओ-शादाबी थी मगर बर्ग-ए-ख़िज़ाँ रसीदा गिरा ख़ार के लिए इस्मत-फ़रोश कोई नहीं इस जहान में लेकिन चले है बिकने को घर-बार के लिए रख़्त-ए-सियाह छाने लगी घर में इस क़द्र सोहेल-ए-ख़स्ता अब चलो दीदार के लिए — Shaikh Sohail
तू ही बर्बाद करे तू ही सम्भाले दिल को आसरा तू ही दे और तू ही निकाले दिल को दिल को आदत नहीं इस सादगी पर मरने की ये तिरी सादा-दिली मार न डाले दिल को ये तिरे रुख़ पे जो तिल है ना वो सुब्हान-अल्लाह दौलत-ए-हुस्न है अच्छे से सता ले दिल को तेरे हर ज़ख़्म को मैं दिल से लगा लेता हूँ तू भी तो काश कभी मुझ से लगा ले दिल को दिल पे ऐ शख़्स क़यामत सी गुज़र जाएगी इक दफ़ा अपनी निगाहों से चुरा ले दिल को वस्ल के दिन तो गए हिज्र की शब आई है फिर कहीं जा तू कहीं जा के छुपा ले दिल को सुर्ख़ क़ालीन नहीं हम से बिछाई जाती तेरी राहो में बता कैसे बिछा ले दिल को मेरे इज़हार पे कहती हो मज़ाक़ अच्छा है इस से बेहतर है कि तू सब से लगा ले दिल को ऐ ख़ुदा अब न तमन्ना है मुझे उस दिल की वो तो किश्तों में खिलाती है निवाले दिल को यूँँ तो हर चीज़ सलामत है 'सुहैल' इस दिल की ख़ैर तू जा के कहीं कर दे हवाले दिल को — Shaikh Sohail
उन के रुख़सार पे मर मर के वो आना दिल का कितना मुश्किल है हसीनों से बचाना दिल का हम सुनाए जो कभी दिल से फ़साना दिल का सब सुना पर वो कभी दर्द ना जाना दिल का हम को आता है फ़क़त दिल से लगाना दिल का उन को आया है तो बस दिल ही दिखाना दिल का उन का अंदाज़-ए-अदावत कहो सुब्हान-अल्लाह वो तो सीधा ही लगाते हैं निशाना दिल का ठीक से बात भी करने नहीं आती थी उन्हें अब तो आ जाता है औरों से लगाना दिल का मात खाते हैं यहाँ दिल को लगाने वाले भारी पड़ जाता है अक्सर यूँँ लगाना दिल का बे-रूख़ी ऐसी के अब हाए परेशान है दिल, बे-दिली ऐसी के हम ढूँढ़े ठिकाना दिल का जब थे वो साथ तभी दिल पे यूँँ जलवा था के अब उन के ना होने से लगता है ना होना दिल का जब कभी रास्ते में दफ़'अतन मिल जाए कहीं उन को बस देखते फूले ना समाना दिल का उन से मिलने को 'सोहेल' इतना मचलते भी हो उन से ना मिलने पे करते हो बहाना दिल का — Shaikh Sohail

Nazm

"अजब नहीं है" अजब नहीं हैं कि बिन तुम्हारे वो लफ्ज़ सारे जो मेरे पन्नों पे सो रहे हैं कि जैसे चेहरे को तुम ने फेरा ऐसे करवट बदल रहे हैं अजब नहीं हैं वो शे'र सारे जो थे हमारे हमारी भीगी क़लम में ऐसे समा गए हैं कि जैसे हद्द से गुज़र रहे हो ये कोरे पन्नों पे बह रहे हो अजब नहीं हैं कहा था तुम ने कि सोहेल सुन लो बता रही हूँ जो मेरे मुह से टपक रहा है वो ख़ून ए दिल की ही आदतें हैं ये सब तुम्हारी इनायतें हैं ये सारी मेरी शिकायतें हैं ये जोश-ए-ख़ून-ए-नदामतें हैं इसीलिए मैं ख़फ़ा हूँ तुम से इसीलिए मैं ये कह रही हूँ कि जो भी नज़्में लिखे हो तुम ने तुम्हारी नज़्में नहीं पढ़ूँगी अजब नहीं हैं जो खूँ थूकन में तुम्हारा ख़ून-ए-जिगर बहा था वो ही तो ख़ून-ए-जिगर को मैं ने मेरी इन आँखों पे जब मला था अभी भी लगता हैं जैसे आँखें वो ताज़ा खूँ फिर बहा रही हो अभी भी लगता हैं जैसे लब पर ख़फ़ा ख़फ़ा सी अदा रही हो लहू थूकन की जो थी अदाएं हर एक बूँदों में थी वफ़ाएँ मगर वफ़ाओं से क्या हुआ हैं मगर अदाओं से क्या हुआ हैं सुनो मगर अब हुआ तुम्हारा कहूँ क्या मैं कुछ वो बात क्या थी कि नज़्म मेरी नहीं पढ़ोगी अगर ये सच है तो फिर ये सुन लो कि लग रहा है तुम पढ़ रही हो तड़प रही हो सुलग रही हो सिमट रही हो मगर अब मैं ने तो बा'द मुद्दत के नज़्म लिक्खा हूँ जैसे तैसे कहीं किसी दिन तुम्हारे ख़्वाबों में नज़्म गाऊँ तो ये मत कहना मुझे नहीं कोई नज़्म सुनना तुम अपनी नज़्में भी ले कर जाओ तुम अपनी ग़ज़लें भी ले कर जाओ अगर मुझे भूल जाना चाहो तो सारी क़स में भी ले कर जाओ अजब नहीं हैं ये सारी क़स में ये सारी नज़्में ये सारी ग़ज़लें जो मैं ने पन्नों पर है उतारा ये पन्ने चाहे कि देखे तुम को कि तुम में ऐसी भी क्या कशिश हैं ये पन्ने चाहे पता लगाना कि कौन हो तुम जो इतने दिलकश है लब तुम्हारे बताओ भी क्या है नाम तुम्हारा इन्हें बता दूँ अगर तो फिर ये दीवाने पागल ना जी सकेंगे इन्हें बताना नहीं मुनासिब ये बे-ख़बर हो तभी सही है कि नाम भी अब कहीं नहीं है अजब नहीं हैं वो भीगे पन्नों पे ना लिखा था जो नाम अब तक वो नाम अब मैं छुपा छुपा कर रखूँगा कब तक मुझे ये लगता है कि अब तो तुम्हारा वक़्त भी गुज़र चुका है ये पानी सर से उतर चुका है ना कोई ख़्वाहिश कि तुम अब आओ ना कोई हसरत ना आरज़ू हैं ना कोई हिम्मत बची हैं हम में ना कोई साथी ना गुफ़्तगू हैं अजब नहीं हैं ये नज़्म कह दे जो कुछ भी लिक्खा है, बस भी कर दो लिखोगे कितना बताओ सोहेल अब तुम ही बोलो मैं क्या बताऊँ ये मेरी बातों से बे-ख़बर हैं ये मेरे लफ़्ज़ों का ही असर हैं अजब नहीं हैं मगर ये सुन लो बता रहा हूँ जो मेरे लफ़्ज़ों से मो'अतबर थे वो ही तो तुम थे वो ही तो तुम थे वो ही तो तुम थे — Shaikh Sohail
"मुझे लगता है कि तुम हो" कहीं पे चाँद आ चमके मुझे लगता है कि तुम हो कहीं पे तारे जब दमके मुझे लगता है कि तुम हो कहीं बारिश की घटा हो कहीं गुम-सुम सी फ़ज़ा हो कहीं आँखों का मिलन हो कहीं रुख़सार की वाह हो कोई फ़ुर्क़त से मिला हो वो नज़र कैसी हो क्या हो मुझे लगता है कि तुम हो मेरे आँगन के किनारे कहीं एक फूल जब महके मेरी हर रात जिस की याद में आरज़ू कह के कहीं हो ख़ुर सा रौशन कहीं वो अक्स-ए-हिना हो मुझे लगता है कि तुम हो तुम्हारें नाम का हमनाम कहीं कुछ देर ठहरा हो तुम्हारी तरह कोई शख़्स किसी कोने में बैठा हो कहीं आँखों में पानी हो कहीं दरिया भी सूखा हो कहीं फूलों के गुलशन में कोई चिड़िया सा चहका हो किसी गुम-नाम से रस्ते कोई आवाज़ बुलवाएँ किसी दोशीज़ा की ख़ुशबू मुलाक़ात मुझ से करवाएँ किसी शब में किसी दिन के तअल्लुक़ मुझ से हो जाए कहीं दिलकश लबों से फिर कोई दो बात सुलझाएँ कहीं आँचल में हो पहलू कहीं पैरों में पायल हो मुझे लगता है कि तुम हो कहाँ ये बात तुम सेे हो कहाँ ये रात तुम सेे हो कहाँ सोहेल भी चाहे कि मुलाक़ात तुम सेे हो कहाँ हो सोहेल की नज़्में कहाँ है उन का माह-चेहरा कि जैसे एक तिल बैठा दिए रुख़सार पर पहरा करम हो 'सोहेल' ख़स्ता पर कि मैं हूँ अदना सा शाइ'र मगर जब शे'र सुन कर कोई मुझ पर, दाद देता हो मुझे लगता है कि तुम हो — Shaikh Sohail