teg-e-qalam chala faqt ashaar ke li.e | तेग़-ए-क़लम चला फ़क्त अशआर के लिए

  - Shaikh Sohail

तेग़-ए-क़लम चला फ़क्त अशआर के लिए
सैफ़-ए-ज़बाँ ख़मोश रही यार के लिए

ताब-ए-सुख़न नहीं है कुछ अनवार के लिए
लिखने चला हूँ वस्फ़-ए-रुख़-ए-यार के लिए

तस्लीम-ए-जुर्म करता हूँ इज़हार के लिए
अफ़सुर्दा हो गया हूँ बस इक प्यार के लिए

मैं इक सवाल कर के परेशान हो गया
सारे जवाब देने लगे यार के लिए

असबाब-ए-रंज-ओ-'ऐश हमें कुछ पता नहीं
कहते हैं लोग मरते हैं हम यार के लिए

बाग़-ओ-बहार ख़रमी-ओ-शादाबी थी मगर
बर्ग-ए-ख़िज़ाँ रसीदा गिरा ख़ार के लिए

इस्मत-फ़रोश कोई नहीं इस जहान में
लेकिन चले है बिकने को घर-बार के लिए

रख़्त-ए-सियाह छाने लगी घर में इस क़द्र
सोहेल-ए-ख़स्ता अब चलो दीदार के लिए

  - Shaikh Sohail

Valentine Shayari

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