ना जाने कहाँ मेरे ख़्वाबों की दुनिया
बसर करती जिस
में गुलाबों की दुनिया
वो पर्दा-नशीली सी आँखों का मंज़र
वो मासूम सी बा-हिजाबों की दुनिया
जो दुनिया में तर्क-ए-अना से था ग़ाफ़िल
उसे क्या ख़बर हो सवाबों की दुनिया
हमारी ग़ज़ल का सितम इतना सा है
लिखा है हमीं ने अज़ाबों की दुनिया
सोहेल ऐसी दुनिया उन्हीं को मुबारक
जिन्हें हो हवस ला-जवाबों की दुनिया
— Shaikh Sohail















