न तो कामिल न ही तामीर में हैं
हमारे ख़्वाब अभी ज़ंजीर में हैं
अभी कुछ मश्क़ बाक़ी है मुसव्विर
अभी कुछ ख़ामियाँ तस्वीर में हैं
तेरी ज़ुल्फ़ों में जितने ख़म हैं उनसे
ज़ियादा तो मेरी तक़दीर में हैं
वसीयत में बताओ क्या लिखूँ मैं
तजरबे ही मेरी जागीर में हैं
क़वाफ़ी जी़स्त के निभने न देंगे
जो नुक़्ते बख़्त की तहरीर में हैं
आरज़ू अब के बद-हवास न थी
हमको क़िस्मत से इतनी आस न थी
आज पहली दफ़ा शराब चखी
उनके होंठों के आस-पास न थी
वक़्त-ए-रुख़्सत वो हम को चेहरे से
लग रही थी मगर उदास न थी
बाद मुद्दत के उनका फ़ोन आया
नर्म लहजा था पर मिठास न थी
शक्ल ही ऐसी कुछ मिली थी हमें
वजह उदासी की कोई पास न थी
शरबतों से बुझा भी लेते मगर
इतनी जाहिल हमारी प्यास न थी
तुम्हें कोई परेशानी नहीं तो
हमें लग तो रहा जानी नहीं तो
चलो माना ये सुर्ख़ी नींद की है
तो फिर ये आँख में पानी नहीं तो
मिटा ख़ुद को रहा जिसके लिए तू
तेरी वो भी है दीवानी नहीं तो
उसे अहल-ए-मुसाहिब कर लिया है
मगर क्या ज़ात पहचानी नहीं तो
ग़ज़ल पर वाहवाही दी नवाज़िश
समझ में आ गए मा’नी नहीं तो
मिला क्या कुछ नहीं दुनिया में ‘मौजी’
मिले माँ-बाप के सानी नहीं तो
तू माँ है बहन है तू बेटी है नारी
ये सृष्टि तुम्हीं से है सारी की सारी
है तर्पण समर्पण अलंकार तेरे
जटा से तभी शिव ने भू पर उतारी
नहीं कोई शक्ति का पर्याय तुम सा
मगर आदमी की कुदृष्टि से हारी
उरस्थल का तेरे ये प्रारब्ध कैसा
तेरा दूध बन बैठा तेरा शिकारी
उठो मानवी रण की भेरी बजा दो
विजय हो तुम्हारी विजय हो तुम्हारी
कलाम कर रहा हूँ ख़ुद ही से मैं दर्पन में
ख़ुशी समा ही नहीं पा रही है दामन में
बदन का बोझ फ़क़त साथ चल रहा है मेरे
उलझ के रह गया है मन किसी के कंगन में
रखे वो पाँव ज़मीं पर तो ग़ौर से सुनना
सुनाई दूँगा हसीं पायलों की छन छन में
मैं माँगता था जिसे आसमाँ से शाम-ओ-सहर
वो चाँद ख़ुद ही उतर आया मेरे आँगन में
मुझे ये डर है न लग जाए चोट सीने पर
धड़क रहा है मुसलसल वो मेरी धड़कन में
अगर हो नक़्ल में माहिर, तो दोहरा कर दिखाओ ये
हमें तुम से मुहब्बत है, हमें तुमसे मुहब्बत है
बाद मुद्दत के हमने घर देखा
यूँ लगा ज्यूँ ख़ुदा का दर देखा
खिड़कियाँ देखी,बाम ओ दर देखा
फिर दीवारों को आँख भर देखा
इक शजर रोया देख कर मुझको
ला-मकानी का जब असर देखा
उसने आँखों में झाँकना चाहा
आँख नम थी, इधर उधर देखा
याद बाबा की ख़ूब आई हमें
हमने जब माँ का सूना सर देखा