Manmauji
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आज पहली दफ़ा शराब चखी
उन के होंठों के आस-पास न थी
वक़्त-ए-रुख़्सत वो हम को चेहरे से
लग रही थी मगर उदास न थी
बा'द मुद्दत के उन का फ़ोन आया
नर्म लहजा था पर मिठास न थी
शक्ल ही ऐसी कुछ मिली थी हमें
वजह उदासी की कोई पास न थी
शरबतों से बुझा भी लेते मगर
इतनी जाहिल हमारी प्यास न थी
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तुम्हें कोई परेशानी नहीं तो
हमें लग तो रहा जानी नहीं तो
हमें लग तो रहा जानी नहीं तो
चलो माना ये सुर्ख़ी नींद की है
तो फिर ये आँख में पानी नहीं तो
मिटा ख़ुद को रहा जिस के लिए तू
तेरी वो भी है दीवानी नहीं तो
उसे अहल-ए-मुसाहिब कर लिया है
मगर क्या ज़ात पहचानी नहीं तो
ग़ज़ल पर वाहवाही दी नवाज़िश
समझ में आ गए मा’नी नहीं तो
मिला क्या कुछ नहीं दुनिया में ‘मौजी’
मिले माँ-बाप के सानी नहीं तो
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तू माँ है बहन है तू बेटी है नारी
ये सृष्टि तुम्हीं से है सारी की सारी
ये सृष्टि तुम्हीं से है सारी की सारी
है तर्पण समर्पण अलंकार तेरे
जटा से तभी शिव ने भू पर उतारी
नहीं कोई शक्ति का पर्याय तुम सा
मगर आदमी की कुदृष्टि से हारी
उरस्थल का तेरे ये प्रारब्ध कैसा
तेरा दूध बन बैठा तेरा शिकारी
उठो मानवी रण की भेरी बजा दो
विजय हो तुम्हारी विजय हो तुम्हारी
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Manmauji
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