kalaam kar raha hooñ main khudi se darpan men | कलाम कर रहा हूँ ख़ुद ही से मैं दर्पन में

  - Manmauji

कलाम कर रहा हूँ ख़ुद ही से मैं दर्पन में
ख़ुशी समा ही नहीं पा रही है दामन में

बदन का बोझ फ़क़त साथ चल रहा है मेरे
उलझ के रह गया है मन किसी के कंगन में

रखे वो पाँव ज़मीं पर तो ग़ौर से सुनना
सुनाई दूँगा हसीं पायलों की छन छन में

मैं माँगता था जिसे आसमाँ से शाम-ओ-सहर
वो चाँद ख़ुद ही उतर आया मेरे आँगन में

मुझे ये डर है न लग जाए चोट सीने पर
धड़क रहा है मुसलसल वो मेरी धड़कन में

  - Manmauji

Aangan Shayari

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