ज़िंदगी यूँँ तो अच्छी ख़ासी है
जाने क्यूँ आँख में उदासी है
क्यूँ हिरण ढूँढ़ता है कस्तूरी
क्यूँ समुंदर में मीन प्यासी है
ख़्वाहिशें अब ज़िरह नहीं करतीं
बात सुनने में तो ज़रा सी है
रूह ने फिर पहन लिए घुँघरू
रूह वैसे भी देवदासी है
जब तू मंज़ूर, तेरा सब मंज़ूर
ये मुहब्बत में हक़-शनासी है
शे’र पढ़ते हुए ख़याल आया
ये ख़यालों की बे-लिबासी है
— Manmauji















