mukhtasar hote hue bhi zindagi badh jaayegi | मुख़्तसर होते हुए भी ज़िन्दगी बढ़ जाएगी

  - Munawwar Rana

मुख़्तसर होते हुए भी ज़िन्दगी बढ़ जाएगी
माँ की आँखें चूम लीजे रौशनी बढ़ जाएगी

  - Munawwar Rana

Raushni Shayari

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    तेरे बग़ैर ख़ुदा की क़सम सुकून नहीं
    सफ़ेद बाल हुए हैं हमारा ख़ून नहीं

    न हम ही लौंडे लपाड़ी न कच्ची उम्र का वो
    ये सोचा समझा हुआ इश्क़ है जुनून नहीं
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    Shamim Abbas
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    अज़ कबीर-ओ-रंग-ए-केसर और गुलाल
    अब्र छाया है सफ़ेद-ओ-ज़र्द-ओ-लाल
    Faez Dehlvi
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    अँधेरों में भले ही साथ छोड़ा था हमारा
    मगर जब रौशनी लौटी तो साए लौट आए
    Vikas Sahaj
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    इस लिए रौशनी में ठंडक है
    कुछ चराग़ों को नम किया गया है
    Tehzeeb Hafi
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    लड़कियाँ बैठी थीं पाँव डालकर
    रौशनी सी हो गई तालाब में
    Parveen Shakir
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    मैं ख़ुद को एक गड्ढे में क्यूँ दबा रहा हूँ
    इक फूल के लिए ख़ुद मिट्टी बना रहा हूँ

    मालूम है मुझे वो बच्ची नहीं है फिर भी
    मैं जान बूझ कर के सर पर चढ़ा रहा हूँ

    जिस फूल में मिरी कुल दुनिया रची-बसी है
    उस के लिए मैं दिल में सूरज उगा रहा हूँ

    कोई नहीं मिला जब इस भोर के समय में
    सो मैं भी क्रांति को कम्बल में सुला रहा हूँ

    उस के मकान में जिस से रौशनी हुई है
    उस लैम्प में मैं अपना ही खून पा रहा हूँ
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    Ajit Yadav
    रोशनी बढ़ने लगी है शहर की
    चाँद छत पर आ गया है देखिए
    Divy Kamaldhwaj
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    मिरी रौशनी तिरे ख़द्द-ओ-ख़ाल से मुख़्तलिफ़ तो नहीं मगर
    तू क़रीब आ तुझे देख लूँ तू वही है या कोई और है
    Saleem Kausar
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    चाँद भी हैरान दरिया भी परेशानी में है
    अक्स किस का है कि इतनी रौशनी पानी में है
    Farhat Ehsaas
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    ज़मीन-ओ-आसमाँ को जगमगा दो रौशनी से
    दिसम्बर आज मिलने जा रहा है जनवरी से
    Bhaskar Shukla
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As you were reading Shayari by Munawwar Rana

    थकन को ओढ़ के बिस्तर में जा के लेट गए
    हम अपनी क़ब्र-ए-मुक़र्रर में जा के लेट गए

    तमाम उम्र हम इक दूसरे से लड़ते रहे
    मगर मरे तो बराबर में जा के लेट गए

    हमारी तिश्ना-नसीबी का हाल मत पूछो
    वो प्यास थी कि समुंदर में जा के लेट गए

    न जाने कैसी थकन थी कभी नहीं उतरी
    चले जो घर से तो दफ़्तर में जा के लेट गए

    ये बेवक़ूफ़ उन्हें मौत से डराते हैं
    जो ख़ुद ही साया-ए-ख़ंजर में जा के लेट गए

    तमाम उम्र जो निकले न थे हवेली से
    वो एक गुम्बद-ए-बे-दर में जा के लेट गए

    सजाए फिरते थे झूटी अना जो चेहरों पर
    वो लोग क़स्र-ए-सिकंदर में जा के लेट गए

    सज़ा हमारी भी काटी है बाल-बच्चों ने
    कि हम उदास हुए घर में जा के लेट गए
    Read Full
    Munawwar Rana
    दुनिया भी जैसे ताश के पत्तों का खेल है
    जोकर के साथ रहती है रानी ही क्यों न हो
    Munawwar Rana
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    ये बुत जो हम ने दोबारा बना के रक्खा है
    इसी ने हम को तमाशा बना के रक्खा है

    वो किस तरह हमें इनआ'म से नवाज़ेगा
    वो जिस ने हाथों को कासा बना के रक्खा है

    यहाँ पे कोई बचाने तुम्हें न आएगा
    समुंदरों ने जज़ीरा बना के रक्खा है

    तमाम उम्र का हासिल है ये हुनर मेरा
    कि मैं ने शीशे को हीरा बना के रक्खा है

    किसे किसे अभी सज्दा-गुज़ार होना है
    अमीर-ए-शहर ने खाता बना के रक्खा है

    मैं बच गया तो यक़ीनन ये मो'जिज़ा होगा
    सभी ने मुझ को निशाना बना के रक्खा है

    कोई बता दे ये सूरज को जा के हम ने भी
    शजर को धूप में छाता बना के रक्खा है
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    Munawwar Rana
    लिपट जाता हूँ माँ से और मौसी मुस्कुराती है
    मैं उर्दू मे ग़ज़ल कहता हूँ हिंदी मुस्कुराती है
    Munawwar Rana
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    छाँव मिल जाए तो कम दाम में बिक जाती है
    अब थकन थोड़े से आराम में बिक जाती है

    आप क्या मुझ को नवाज़ेंगे जनाब-ए-आली
    सल्तनत तक मिरे इनआ'म में बिक जाती है

    शे'र जैसा भी हो इस शहर में पढ़ सकते हो
    चाय जैसी भी हो आसाम में बिक जाती है

    वो सियासत का इलाक़ा है उधर मत जाना
    आबरू कूचा-ए-बद-नाम में बिक जाती है
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    Munawwar Rana

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