zindagi yun hui basar tanhaa | ज़िंदगी यूँ हुई बसर तन्हा

  - Gulzar

ज़िंदगी यूँ हुई बसर तन्हा
क़ाफ़िला साथ और सफ़र तन्हा

  - Gulzar

Musafir Shayari

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    बताऊँ कैसे वो बहता दरिया
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    मैं अपना लिक्खा मिटा रहा था

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    चराग़ को जब बुझा रहा था

    मुंडेर से झुक के चाँद कल भी
    पड़ोसियों को जगा रहा था

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    वो एक दिन एक अजनबी को
    मिरी कहानी सुना रहा था

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    ज़िंदगी यूँ हुई बसर तन्हा
    क़ाफ़िला साथ और सफ़र तन्हा

    अपने साए से चौंक जाते हैं
    उम्र गुज़री है इस क़दर तन्हा

    रात भर बातें करते हैं तारे
    रात काटे कोई किधर तन्हा

    डूबने वाले पार जा उतरे
    नक़्श-ए-पा अपने छोड़ कर तन्हा

    दिन गुज़रता नहीं है लोगों में
    रात होती नहीं बसर तन्हा

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