gurbat men zindagi ka mazaa ham se poochiye | ग़ुर्बत में ज़िंदगी का मज़ा हम से पूछिए

  - Manmauji

ग़ुर्बत में ज़िंदगी का मज़ा हम से पूछिए
फिर उस में शायरी का मज़ा हम से पूछिए

इक शख़्स की कमी का मज़ा हम से पूछिए
यानी कि तिश्नगी का मज़ा हम से पूछिए

मत पूछिएगा हम से कि मंज़िल का क्या हुआ
सहरा-नवर्दगी का मज़ा हम सेे पूछिए

क़िस्मत से खूब खाएँ हैं धोबी-पछाड़ भी
क़िस्मत से दुश्मनी का मज़ा हम से पूछिए

भारी थी दिल की चीख पे लब-बस्तगी मियाँ
होंठों की बुज़दिली का मज़ा हम से पूछिए

इक पल को सोच-सोच के गुज़री तमाम 'उम्र
लम्हे में इक सदी का मज़ा हम से पूछिए

‘मौजी’ रहे न घर के, न ही घाट के हुए
दुश्मन से रहबरी का मज़ा हम से पूछिए

  - Manmauji

Muflisi Shayari

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