मेरे रोने के बा'द क्या होगा
ग़म भिगोने के बा'द क्या होगा
इनसे कुछ रंग तो है दामन में
दाग़ धोने के बा'द क्या होगा
दिन में कार-ए-जहाँ है,उलझनें हैं
शाम होने के बा'द क्या होगा
जिस को पाया है मन्नतों के ब’दल
उस को खोने के बा'द क्या होगा
बस इसी ख़ौफ़ में जगा शब भर
मेरे सोने के बा'द क्या होगा
उम्र भर ग़म के रख़्त का “मौजी”
बोझ ढोने के बा'द क्या होगा
— Manmauji















