Umrez Ali Haider

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Umrez Ali Haider shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Umrez Ali Haider's shayari and don't forget to save your favorite ones.

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Sher

हर तरफ़ है बे-सर-ओ-सामानी तख़्त-ओ-ताज अब तो उछाले जाएँ — Umrez Ali Haider
ये जहाँ सारा है किस के लिए क्यूँ हम आएँ कोई भी जाल में — Umrez Ali Haider
कारोबार एक भी नहीं है साफ़ दिखते हैं सब हराम अपने को — Umrez Ali Haider
क़त्ल मुंसिफ़ ने कर दिया 'हैदर' अब है मुश्किल कोई सज़ा होना — Umrez Ali Haider
क़त्ल मुंसिफ़ ने कर दिया हैदर देखिए किस को है सज़ा होना — Umrez Ali Haider
ये अहल ए सुख़न का भी पड़ना है मुश्किल में जो मिल जाए दाद एक शाइ'र को महफ़िल में — Umrez Ali Haider
कही है कब ग़ज़ल मैं ने कही है ज़िन्दगी अपनी कभी सोचा कहाँ था मैं तुम्हारी दाद में आना — Umrez Ali Haider
हमीं को करता है तज़लील हैदर हमीं पर है उसे पिन्दार लेकिन — Umrez Ali Haider
सुनो बातिल , मिरा ईमाँ फ़क़त है क़लमा-ए-तौहीद। डरा सकता नहीं मुझ को तिरा ता'दाद में आना।। — Umrez Ali Haider
बस इक नुक़्ते पर खींच लाएँ जहाँ को हम मोहब्बत हमारी जो गिर्दाब हो जाए — Umrez Ali Haider
दिल में कोई हमारे है हैदर जो हमीं से वफ़ा कराए हमें — Umrez Ali Haider
रोज़-ओ-शब के हैं मशग़ले 'हैदर' सुब्ह था में कि शाम अपने को — Umrez Ali Haider
अब तो अपने न दिन न रात ही हैं नींद आती न काम होता है — Umrez Ali Haider
तेरी बेरुख़ी ने किया है जो आतिशपा मुझे मौत आए तेरी याद आने पर — Umrez Ali Haider
ज़माने भी दुआ देंगे ख़ुदा का शुक्र है बोलो तिरा अहल ए सुख़न के क़िस्सा ए फ़रियाद में आना — Umrez Ali Haider
हम आख़िर तक जिए हैं जिन की ख़ातिर वही लोग अब हुए अग़यार लेकिन — Umrez Ali Haider
हर इक सू हैं दर-ओ-दीवार लेकिन मुयस्सर है नहीं घर-बार लेकिन — Umrez Ali Haider
"जिगर" सुन अगर इश्क़ दरिया-ए-आतिश ये माना मगर, मैं भी आब-ए-समुंदर — Umrez Ali Haider

Ghazal

मिल अगर जाए तो बताए हमें आदमी है कहाँ दिखाए हमें दिल हमें भी है हम भी अहल-ए-ज़ुबाँ कुछ तो कोई सुने सुनाए हमें दिल हमारा तो मर चुका तुम से कौन अब राब्ता कराए हमें जो उन्हें इस क़फ़स में रहना है आशियाना वो फिर बनाए हमें अब ये आलम कि मरने भी हम जाएँ बिस्तर-ए-मर्ग भी सताए हमें ये न कर वो न कर ये क्या किया है यूँँ कहे है वो यूँँ सिखाए हमें हम भी कोई ग़ज़ल हैं राग और लय अहल-ए-दुनिया तो गुनगुनाए हमें हो सके हम कहीं न मर जाएँ दिल से गर वो कभी बुलाए हमें बिस्तर-ए-मर्ग हम जो सो रहे हैं देखना अब कि कौन उठाए हमें दिल में कोई हमारे है 'हैदर' जो हमीं से वफ़ा कराए हमें — Umrez Ali Haider
किसी को याद में रखना किसी की याद में आना ये भी है ज़िन्दगी का सच हर इक रूदाद में आना ख़िज़ाँ का यूँँ चले जाना बहार-ए-नौ के आने पर ये बिल-आख़िर अलामत है चमन का माद में आना वही शाही वही दौराँ ज़माने में चले कब तक कि सुलतानी ज़रूरी तो नहीं शहज़ाद में आना जहाँ तुम को बनाना है महल अपना बनाओ तुम मगर लाज़िम है संग-ओ-ख़िश्त का बुनियाद में आना सुनो बातिल मेरा ईमाँ फ़क़त है क़लमा-ए-तौहीद डरा सकता नहीं मुझ को तिरा तादाद में आना सभी को है पड़ी अपनी कहाँ होता किसी से भी यहाँ अब तो ज़रूरतमंद के इमदाद में आना कहाँ लिक्खी ग़ज़ल मैं ने कि लिक्खी ज़िंदगी अपनी कभी सोचा कहाँ था मैं तुम्हारी दाद में आना मिलेगा क्या ज़माने को ख़सारे के सिवा हैदर गवारा क्यूँ करे कोई चमन बर्बाद में आना — Umrez Ali Haider
जो रहता था अंदर मिरे वो गुज़र गया मैं जो था कोई आशियाना बिखर गया मिरा दिल जो मुझ में था वो भी गुज़र गया मैं था ज़िन्दगी का कोई घर बिखर गया कहा उस ने जो भूल जाओ मुझे तुम अब गया मर मैं उस के लिए और मर गया इसी दुनिया में रह कर अपनी में था जो गुम खुली आँख फिर और यक-लख़्त डर गया करे क्या शजर जो गया झड़ बहार में मरे कि जिए रंग जिस का उतर गया नया ज़ख़्म आने ही वाला है फिर कोई ये अब के बरस ज़ख़्म पिछला जो भर गया ये इंसाँ की जाँ ली मोहब्बत ने याँ, मगर ग़ज़ब ये कि इल्ज़ाम इंसाँ के सर गया किसी से रहा न मुझे अब गिला कोई ख़ुदी को ख़ुदी में फ़ना जो मैं कर गया न कोई है अपना नहीं अब किसी का मैं जो ये वक़्त बदले ज़माना मुकर गया ये मैं अब कहाँ मैं कि वहमो-गुमाँ में तू सुना तू कहा तू गया मैं जिधर गया — Umrez Ali Haider
जो कहता है कि मुझ को तो फ़क़त तुम से मोहब्बत है भरोसा उस पे मत करना फ़रेबी की ये ख़सलत है जिसे आने की हसरत थी मिरे दिल में वफ़ा ले कर मिरे दिल से निकलकर अब उसे जाने की उजलत है मोहब्बत कर के तू ने फिर अदावत की है इस बाबत मुझे तुझ पे तो आती शर्म, क्या तुझ को भी ग़ैरत है कटहरे में तो जाना है तुझे भी रोज़-ए-महशर कल अदालत है यहाँ तेरा ख़ुदा का वाँ अदालत है कि ख़ाकी जिस्म तेरी ज़िन्दगी क्या है सिवा इस के ये जीते जी तू महफ़िल है वो मरने पे तू ख़लवत है मेरी बोली लगाते हो कि ख़ुद के जैसा समझे हो ख़रीदा जा नहीं सकता, मेरी अनमोल क़ीमत है ये बद-बख़्ती उसी की है कि उस ने मुझ को छोड़ा है जहन्नुम उस की मंज़िल अब कि खोई उस ने जन्नत है — Umrez Ali Haider
रक़ाबत से ही है मोहब्बत में मानी यही है फ़क़त शर्त-ए-इश्क़-ए-मजाज़ी सराबी है सूरत ये क़ामत हबाबी कि नाज़ा न हो तुम ये हस्ती है फ़ानी ग़म-ए-इश्क़ से ज़ब्त-ए-ग़म पे रुके हैं थे जो बे-मकाँ हो गए बा-मकानी जहाँ तो मजाज़ी हक़ीक़त ख़ुदा है ख़ुदा ही हक़ीक़ी ख़ुदा ही दवामी है मौजूदगी तेरी सारे जहाँ में ये क़ामत दराज़ी है तेरी निशानी तुझे इश्क़ मुझ सेे मुझे इश्क़ तुझ सेे तो पास-ए-वफ़ा फिर वही लन-तरानी कहाँ था मैं लाइक़ तेरी बन्दगी के है तेरी इनायत ये बन्दा-नवाज़ी था होना तुम्हें तो जवाब-ए-सवाल बने तुम हो लेकिन जहाँ में सवाली वो चेहरे सवाली ये चेहरे पे नालिश यही तो है 'हैदर' जहान-ए-ख़राबी — Umrez Ali Haider
चाहिए काम ओ नाम अपने को देते हो क़ैद ए दाम अपने को अब तो अपने न दिन न रात ही हैं नींद आती न काम अपने को बैठ जाएँ जो हम तो मर जाएँ ज़ीस्त है राह ओ गाम अपने को गर मगर क्यूँ हराम पर कहने हैं तो हैं फिर हराम अपने को कार ओ बार एक भी नहीं है साफ़ दिखते हैं सब हराम अपने को मयकशी की है बे क़रारी जो खींचे है कोई जाम अपने को ज़िन्दगी जो कोई सफ़र है याँ चलने हैं बस मदाम अपने को आशियाना मिरा मुकर गया यूँँ देखे है दर न बाम अपने को हम न इतराएं क्यूँ बता हैदर चाहे है सुर्ख़ फ़ाम अपने को रोज़ ओ शब के हैं मशग़ले हैदर सुब्ह था में कि शाम अपने को — Umrez Ali Haider
न राजा न कोई फ़क़ीर हूँ मैं रंज-ओ-अलम की लकीर हूँ जो अपनी नज़र में कबीर हूँ सो उस की नज़र में हक़ीर हूँ जो दिल में लगा कोई तीर हूँ ग़मे-दिल में दर्द-ए-कसीर हूँ मुझे दिल की नज़रों से देखना बहुत कुछ दिखेगा, ज़मीर हूँ यहाँ अपनी मर्ज़ी चला हूँ कब सो मरता क़फ़स में असीर हूँ ये मानो न मानो यही है सच मैं अपने ज़माने का मीर हूँ किसी को मैं क्या दूँ जहान में यहाँ मैं तो ख़ुद बे-नज़ीर हूँ छुपेगा न मंज़र-निगार तू यहाँ मैं भी मंज़र-पज़ीर हूँ जहाँ तुम तमाशा दिखाते हो वहाँ का तो मैं ही मुदीर हूँ कोई आ लड़े जो कभी तो फिर मैं हर आन तरकश-ओ-तीर हूँ कभी भी तुम्हें कर दूँ मैं ये फ़ाश सुनो मैं भी हंगामा-गीर हूँ सलाम-ओ-दुआ बा'द है क़ज़ा कि "हैदर" मैं अब वक़्त-अख़ीर हूँ — Umrez Ali Haider
पलक बंद कर आसमाँ देखता हूँ खुले आँख फिर मैं जहाँ देखता हूँ यहाँ फिर वहाँ फिर जहाँ देखता हूँ कोई राज़ राज़-ए-निहाँ देखता हूँ जहाँ को जो मैं आसमाँ देखता हूँ ज़मीं को सो मैं आशियाँ देखता हूँ जहाँ देखता हूँ निहाँ देखता हूँ ये मैं क्यूँ यहाँ फिर वहाँ देखता हूँ नया रंग–ओ–बू मैं अयाँ देखता हूँ लब-ओ-रुख़ है बदला जहाँ देखता हूँ मैं भी जलने लगता हूँ शोलों के जैसे कहीं जब निकलता धुआँ देखता हूँ जहाँ तक उफ़क़-बे-कराँ देखता हूँ वहाँ तक मैं अपना मकाँ देखता हूँ इधर फिर उधर फिर जहाँ देखता हूँ पस-ए-इश्क़ मैं फिर ज़ियाँ देखता हूँ जहाँ में अजब दिल-सिताँ देखता हूँ वतन जब ये हिन्दोस्ताँ देखता हूँ जिसे सर से पा तक निहाँ देखता हूँ शब-ए-वस्ल हो फिर अयाँ देखता हूँ है लगता, यहाँ है न पीर-ए-मुग़ाँ अब मैं हर सू जो तीर-ओ-कमाँ देखता हूँ हो मुश्किल घड़ी पासबाँ देखता हूँ ये हर दम किसे मेहरबाँ देखता हूँ उसी को जहाँ का तहाँ देखता हूँ सो "हैदर" किसी को कहाँ देखता हूँ — Umrez Ali Haider
जो दिल में ख़ुदा तो कभी दिल-रुबा है बताओ वो दिल है कि ख़ाना-ख़ुदा है है तेरी तजल्ली यहाँ भी वहाँ भी सो क़ामत दराज़ी तेरी जा-बजा है है जिस में सदाक़त अदालत शुजाअत ये सारा जहाँ फिर उसी की रिदा है ये आईना-ख़ाना है तमसील-ए-दुनिया सो हर अक्स-ए-आईना ख़ल्क़-ए-ख़ुदा है मुझे तुम भी अब तो नहीं सुन सकोगे कि मेरी सदा भी ख़ामोशी सदा है जिगर किरची–किरची है अब जान अटकी मोहब्बत है ख़ूनी मोहब्बत बला है ये पगड़ी ने जो की है ख़ून-ए-मुहब्बत तेरी अब ख़ता है न मेरी ख़ता है मुझे याद घर की है आती कि अब तो जो रस्ता दिखा दे वो बाद-ए-सबा है मोहब्बत जो तुम को हुई है तो फिर अब ये बिन मौत मरना तुम्हारी सज़ा है दिया क्या है तुम ने सिवा ग़म के "हैदर" ये दिल ग़म का जो आशियाना बना है — Umrez Ali Haider
ज़िन्दगी सर-बसर नहीं होती जब तलक मौत गर नहीं होती फ़ायदे हैं तिरे बहुत लेकिन कोई शय बे-ज़रर नहीं होती कब सफ़र ज़िन्दगी का भारी है चश्म-ए-तर जब गुहर नहीं होती बेबसी आख़िर उस की क्या होगी चिड़िया जिस के भी पर नहीं होती रौशनी जब कभी निकलती है रौशनी फिर किधर नहीं होती जब पसीने बहाए उस ने फिर क्यूँ क़बा तर-बतर नहीं होती तेरी यादें कहाँ–कहाँ जाए दम-ब-दम रह-गुज़र नहीं होती ख़्वाहिश-ए-बाल-ओ-पर नहीं है गर जुम्बिश-ए-बाल-ओ-पर नहीं होती जब ये शो'ला–दरून फटता है ज़ीस्त फिर क्यूँ शरर नहीं होती रोज़ मैं दिल के परचे पढ़ता हूँ बज़्म-ए-दिल है कि सर नहीं होती ख़ूब है ज़िन्दगी जहाँ "हैदर" ख़ूब से ख़ूब–तर नहीं होती — Umrez Ali Haider