चाहिए काम ओ नाम अपने को
देते हो क़ैद ए दाम अपने को
अब तो अपने न दिन न रात ही हैं
नींद आती न काम अपने को
बैठ जाएँ जो हम तो मर जाएँ
ज़ीस्त है राह ओ गाम अपने को
गर मगर क्यूँ हराम पर कहने
हैं तो हैं फिर हराम अपने को
कार ओ बार एक भी नहीं है साफ़
दिखते हैं सब हराम अपने को
मयकशी की है बे क़रारी जो
खींचे है कोई जाम अपने को
ज़िन्दगी जो कोई सफ़र है याँ
चलने हैं बस मदाम अपने को
आशियाना मिरा मुकर गया यूँ
देखे है दर न बाम अपने को
— Umrez Ali Haider














