जो कहता है कि मुझको तो फ़क़त तुम से मोहब्बत है
भरोसा उसपे मत करना फ़रेबी की ये ख़सलत है
जिसे आने की हसरत थी मिरे दिल में वफ़ा लेकर
मिरे दिल से निकलकर अब उसे जाने की उजलत है
मोहब्बत कर के तूने फिर अदावत की है इस बाबत
मुझे तुझपे तो आती शर्म, क्या तुझको भी ग़ैरत है
कटहरे में तो जाना है तुझे भी रोज़-ए-महशर कल
अदालत है यहाँ तेरा ख़ुदा का वाँ अदालत है
कि ख़ाकी जिस्म तेरी ज़िन्दगी क्या है सिवा इसके
ये जीते जी तू महफ़िल है वो मरने पे तू ख़लवत है
मेरी बोली लगाते हो कि ख़ुद के जैसा समझे हो
ख़रीदा जा नहीं सकता, मेरी अनमोल क़ीमत है
ये बद-बख़्ती उसी की है कि उसने मुझको छोड़ा है
जहन्नुम उसकी मंज़िल अब कि खोई उसने जन्नत है
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