जो रहता था अंदर मिरे वो गुज़र गया

मैं जो था कोई आशियाना बिखर गया

मिरा दिल जो मुझ में था वो भी गुज़र गया
मैं था ज़िन्दगी का कोई घर बिखर गया

कहा उस ने जो भूल जाओ मुझे तुम अब
गया मर मैं उस के लिए और मर गया

इसी दुनिया में रह कर अपनी में था जो गुम
खुली आँख फिर और यक-लख़्त डर गया

करे क्या शजर जो गया झड़ बहार में
मरे कि जिए रंग जिस का उतर गया

नया ज़ख़्म आने ही वाला है फिर कोई
ये अब के बरस ज़ख़्म पिछला जो भर गया

ये इंसाँ की जाँ ली मोहब्बत ने याँ, मगर
ग़ज़ब ये कि इल्ज़ाम इंसाँ के सर गया

किसी से रहा न मुझे अब गिला कोई
ख़ुदी को ख़ुदी में फ़ना जो मैं कर गया

न कोई है अपना नहीं अब किसी का मैं
जो ये वक़्त बदले ज़माना मुकर गया

ये मैं अब कहाँ मैं कि वहमो-गुमाँ में तू
सुना तू कहा तू गया मैं जिधर गया

— Umrez Ali Haider

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