kahii se to aa.e mugaan ab | कहीं से तो आए मुग़ाँ अब

  - Umrez Ali Haider

कहीं से तो आए मुग़ाँ अब
दिलो-जाँ हुए हैं फुलाँ अब

न बस्ती न सहरा यहाँ अब
मैं जाऊँ तो जाऊँ कहाँ अब

निकलते ही दैरो-हरम से
हैं लड़ते धरम के मुग़ाँ अब

दिलों से निकल के सड़क पर
हैं दीनो-धरम के निशाँ अब

रहे जो न बस्ती में इंसाँ
सो हर सू है जंगल वहाँ अब

बनाता हूँ सहरा को बस्ती
सिवा जो है वहमो-गुमाँ अब

लगाई है कुर्सी ने जो आग
रहा जल ये हिन्दोस्ताँ अब

है मतलब जहाँ में सिवा जो
वफ़ा है न ही दिल-सिताँ अब

मैं बस्ती-ओ-सहरा भी देखा
कहीं भी न अमनो-अमाँ अब

  - Umrez Ali Haider

Paani Shayari

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