ये ग़म का सबब तो ये दीद-ए-नज़र है
वही हम सफ़र है जो ख़ून–ए–जिगर है
कोई काम आता नहीं जुज़ किसी ख़ूँ
जिगर सो जिगर है दिगर सो दिगर है
क़दम कोई आगे नहीं वो बढ़ाया
जो कहता रहा तू मिरा हम सफ़र है
किया है तिरे फ़िक्र ने बूढ़ा जिस को
वो कौन अब कि तेरे लिए कोई सर है
ये आँधी है आई कहाँ से जहाँ में
सभी पेट ख़ाली भरा सबका घर है
यक़ीनन शब-ए-वस्ल तक है ये हिज्राँ
जो ये जाँ है अटकी फ़ुग़ाँ बे-असर है
ग़म-ए-दिल न जीने दिया है न मरने
अज़ीयत में कोई न छोड़ी कसर है
— Umrez Ali Haider















