ye gham ka sabab to ye deed-e-nazar hai | ये ग़म का सबब तो ये दीद-ए-नज़र है

  - Umrez Ali Haider

ये ग़म का सबब तो ये दीद-ए-नज़र है
वही हम सेफ़र है जो ख़ून–ए–जिगर है

कोई काम आता नहीं जुज़ किसी ख़ूँ
जिगर सो जिगर है दिगर सो दिगर है

क़दम कोई आगे नहीं वो बढ़ाया
जो कहता रहा तू मिरा हम सेफ़र है

किया है तिरे फ़िक्र ने बूढ़ा जिसको
वो कौन अब कि तेरे लिए कोई सर है

ये आँधी है आई कहाँ से जहाँ में
सभी पेट ख़ाली भरा सबका घर है

यक़ीनन शब-ए-वस्ल तक है ये हिज्राँ
जो ये जाँ है अटकी फ़ुग़ाँ बे-असर है

ग़म-ए-दिल न जीने दिया है न मरने
अज़ीयत में कोई न छोड़ी कसर है

  - Umrez Ali Haider

Shama Shayari

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