Shahzad Ahmad

Shahzad Ahmad

@shahzad-ahmad

Shahzad Ahmad shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Shahzad Ahmad's shayari and don't forget to save your favorite ones.

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Sher

मुमकिन हो आप से तो भुला दीजिए मुझे पत्थर पे हूँ लकीर मिटा दीजिए मुझे — Shahzad Ahmad
ये समझ के माना है सच तुम्हारी बातों को इतने ख़ूब-सूरत लब झूट कैसे बोलेंगे — Shahzad Ahmad
जलते हैं इक चराग़ की लौ से कई चराग़ दुनिया तिरे ख़याल से रौशन हुई तो है — Shahzad Ahmad
गुज़रने ही न दी वो रात मैं ने घड़ी पर रख दिया था हाथ मैं ने — Shahzad Ahmad
वाक़िआ' कुछ भी हो सच कहने में रुस्वाई है क्यूँँ न ख़ामोश रहूँ अहल-ए-नज़र कहलाऊँ — Shahzad Ahmad
तुझ में कस-बल है तो दुनिया को बहा कर ले जा चाय की प्याली में तूफ़ान उठाता क्या है — Shahzad Ahmad
ज़रा सा ग़म हुआ और रो दिए हम बड़ी नाज़ुक तबीअत हो गई है — Shahzad Ahmad
अब मिरा दर्द मिरी जान हुआ जाता है ऐ मिरे चारागरो अब मुझे अच्छा न करो — Shahzad Ahmad

Ghazal

मुमकिन हो आप से तो भुला दीजिए मुझे पत्थर पे हूँ लकीर मिटा दीजिए मुझे हर रोज़ मुझ से ताज़ा शिकायत है आप को मैं क्या हूँ एक बार बता दीजिए मुझे मेरे सिवा भी है कोई मौज़ू-ए-गुफ़्तगू अपना भी कोई रंग दिखा दीजिए मुझे मैं क्या हूँ किस जगह हूँ मुझे कुछ ख़बर नहीं हैं आप कितनी दूर सदा दीजिए मुझे की मैं ने अपने ज़ख़्म की तशहीर जा-ब-जा मैं मानता हूँ जुर्म सज़ा दीजिए मुझे क़ायम तो हो सके कोई रिश्ता गुहर के साथ गहरे समुंदरों में बहा दीजिए मुझे शब भर किरन किरन को तरसने से फ़ाइदा है तीरगी तो आग लगा दीजिए मुझे जलते दिनों में ख़ुद पस-ए-दीवार बैठ कर साए की जुस्तजू में लगा दीजिए मुझे 'शहज़ाद' यूँ तो शोला-ए-जाँ सर्द हो चुका लेकिन सुलग उठें तो हवा दीजिए मुझे — Shahzad Ahmad
फ़स्ल-ए-गुल ख़ाक हुई जब तो सदा दी तू ने ऐ गुल-ए-ताज़ा बहुत देर लगा दी तू ने तेरी ख़ुश्बू से मिरे दिल में खिले दर्द के फूल सो गई थी जो बला फिर से जगा दी तू ने मेरी आँखों में अँधेरे के सिवा कुछ भी न था इस ख़राबे में ये क्या शम्अ' जला दी तू ने ज़िंदगी भर मुझे जलने के लिए छोड़ दिया सब्ज़ पत्तों में ये क्या आग लगा दी तू ने कोई सूरत भी रिहाई की नहीं रहने दी ऐसी दीवार पे दीवार बना दी तू ने मैं तेरे हाथ न चूमूँ तो ये ना-शुक्री है दौलत-ए-दर्द तमन्ना से सिवा दी तू ने कभी कह दूँ तो ज़माना मेरा दुश्मन हो जाए दिल को वो बात भी चुप रह के बता दी तू ने वो तेरे पास से चुप-चाप गुज़र कैसे गया दिल-ए-बेताब क़यामत न उठा दी तू ने इसे कहने के लिए लफ़्ज़ कहाँ से आए दास्तान-ए-शब-ए-ग़म कैसे सुना दी तू ने उस को भी उस की निगाहों में बहुत ख़्वार किया अपनी तौक़ीर भी मिट्टी में मिला दी तू ने काश वापस तुझे गोयाई न मिलती 'शहज़ाद' बोल कर आज बहुत बात बढ़ा दी तू ने — Shahzad Ahmad
पुराने दोस्तों से अब मुरव्वत छोड़ दी हम ने मु'अज़्ज़िज़ हो गए हम भी शराफ़त छोड़ दी हम ने मुयस्सर आ चुकी है सर-बुलंदी मुड़ के क्यूँँ देखें इमामत मिल गई हम को तो उम्मत छोड़ दी हम ने किसे मा'लूम क्या होगा मआल आइंदा नस्लों का जवाँ हो कर बुज़ुर्गों की रिवायत छोड़ दी हम ने ये मुल्क अपना है और इस मुल्क की सरकार अपनी है मिली है नौकरी जब से बग़ावत छोड़ दी हम ने है उतना वाक़ि'आ उस से न मिलने की क़सम खा ली तअस्सुफ़ इस क़दर गोया वज़ारत छोड़ दी हम ने करें क्या ये बला अपने लिए ख़ुद मुंतख़ब की है गिला बाक़ी रहा लेकिन शिकायत छोड़ दी हम ने सितारे इस क़दर देखे कि आँखें बुझ गईं अपनी मोहब्बत इस क़दर कर ली मोहब्बत छोड़ दी हम ने जो सोचा है 'अज़ीज़ों की समझ में आ नहीं सकता शरारत अब के ये की है शरारत छोड़ दी हम ने उलझ पड़ते अगर तो हम में तुम में फ़र्क़ क्या रहता यही दीवार बाक़ी थी सलामत छोड़ दी हम ने गुनहगारों में शामिल मुद्द'ई भी और मुल्ज़िम भी तिरा इंसाफ़ देखा और 'अदालत छोड़ दी हम ने — Shahzad Ahmad
चराग़ ख़ुद ही बुझाया बुझा के छोड़ दिया वो ग़ैर था उसे अपना बना के छोड़ दिया हज़ार चेहरे हैं मौजूद आदमी ग़ाएब ये किस ख़राबे में दुनिया ने ला के छोड़ दिया मैं अपनी जाँ में उसे जज़्ब किस तरह करता उसे गले से लगाया लगा के छोड़ दिया मैं जा चुका हूँ मिरे वास्ते उदास न हो मैं वो हूँ तू ने जिसे मुस्कुरा के छोड़ दिया किसी ने ये न बताया कि फ़ासला क्या है हर एक ने मुझे रस्ता दिखा के छोड़ दिया हमारे दिल में है क्या झाँक कर न देख सके ख़ुद अपनी ज़ात से पर्दा उठा के छोड़ दिया वो तेरा रोग भी है और तिरा इलाज भी है उसी को ढूँड जिसे तंग आ के छोड़ दिया वो अंजुमन में मिला भी तो उस ने बात न की कभी कभी कोई जुमला छुपा के छोड़ दिया रखूँ किसी से तवक़्क़ो तो क्या रखूँ 'शहज़ाद' ख़ुदा ने भी तो ज़मीं पर गिरा के छोड़ दिया — Shahzad Ahmad
रुख़्सत हुआ तो आँख मिला कर नहीं गया वो क्यूँ गया है ये भी बता कर नहीं गया वो यूँ गया कि बाद-ए-सबा याद आ गई एहसास तक भी हम को दिला कर नहीं गया यूँ लग रहा है जैसे अभी लौट आएगा जाते हुए चराग़ बुझा कर नहीं गया बस इक लकीर खींच गया दरमियान में दीवार रास्ते में बना कर नहीं गया शायद वो मिल ही जाए मगर जुस्तुजू है शर्त वो अपने नक़्श-ए-पा तो मिटा कर नहीं गया घर में है आज तक वही ख़ुश्बू बसी हुई लगता है यूँ कि जैसे वो आ कर नहीं गया तब तक तो फूल जैसी ही ताज़ा थी उस की याद जब तक वो पत्तियों को जुदा कर नहीं गया रहने दिया न उस ने किसी काम का मुझे और ख़ाक में भी मुझ को मिला कर नहीं गया वैसी ही बे-तलब है अभी मेरी ज़िंदगी वो ख़ार-ओ-ख़स में आग लगा कर नहीं गया 'शहज़ाद' ये गिला ही रहा उस की ज़ात से जाते हुए वो कोई गिला कर नहीं गया — Shahzad Ahmad
बिगड़ी हुई इस शहर की हालत भी बहुत है जाऊँ भी कहाँ इस से मोहब्बत भी बहुत है बस एक क़दम का है सफ़र मंज़िल-ए-मक़्सूद रुक जाए तो इतनी सी मुसाफ़त भी बहुत है क्या माँगते हो अपनी दु'आओं में शब-ओ-रोज़ सोचो तो शब-ओ-रोज़ की दौलत भी बहुत है मुश्किल है बहुत जादा-ओ-मंज़िल का तअ'य्युन और मुझ को भटक जाने की आदत भी बहुत है मैं आँख से टपके हुए एक अश्क की मानिंद बे-माया भी हूँ और मेरी क़ीमत भी बहुत है काफ़ी है शब-ए-ग़म के लिए एक दिया भी इस दौर में छोटी सी सदाक़त भी बहुत है वो शख़्स जो गुज़रा है अभी आँख बचाकर 'शहज़ाद' उसे मेरी ज़रूरत भी बहुत है — Shahzad Ahmad
अपनी तस्वीर को आँखों से लगाता क्या है इक नज़र मेरी तरफ़ भी तिरा जाता क्या है मेरी रुस्वाई में वो भी हैं बराबर के शरीक मेरे क़िस्से मिरे यारों को सुनाता क्या है पास रह कर भी न पहचान सका तू मुझ को दूर से देख के अब हाथ हिलाता क्या है ज़ेहन के पर्दों पे मंज़िल के हयूले न बना ग़ौर से देखता जा राह में आता क्या है ज़ख़्म-ए-दिल जुर्म नहीं तोड़ भी दे मोहर-ए-सुकूत जो तुझे जानते हैं उन से छुपाता क्या है सफ़र-ए-शौक़ में क्यूँँ काँपते हैं पाँव तिरे आँख रखता है तो फिर आँख चुराता क्या है उम्र भर अपने गरेबाँ से उलझने वाले तू मुझे मेरे ही साए से डराता क्या है चाँदनी देख के चेहरे को छुपाने वाले धूप में बैठ के अब बाल सुखाता क्या है मर गए प्यास के मारे तो उठा अब्र-ए-करम बुझ गई बज़्म तो अब शम्अ' जलाता क्या है मैं तिरा कुछ भी नहीं हूँ मगर इतना तो बता देख कर मुझ को तिरे ज़ेहन में आता क्या है तेरा एहसास ज़रा सा तिरी हस्ती पायाब तो समुंदर की तरह शोर मचाता क्या है तुझ में कस-बल है तो दुनिया को बहा कर ले जा चाय की प्याली में तूफ़ान उठाता क्या है तेरी आवाज़ का जादू न चलेगा उन पर जागने वालों को 'शहज़ाद' जगाता क्या है — Shahzad Ahmad

Nazm

"क्रिसमस का दरख़्त" मैं भी हूँ गोया क्रिसमस का दरख़्त मेरा रिश्ता भी ज़मीं से आसमाँ से और हवा से कट चुका बाग़ छूटा खेतियाँ छूटीं मैं घर के मरकज़ी कमरे में आ कर डट चुका मेरे बच्चों ने सजाया है मुझे रौशनी के नन्हे नन्हे बल्ब टाँके हैं मिरी बाँहों के साथ मेरी शाख़ों में हैं तोहफ़े मुख़्तलिफ़ रंगों के काग़ज़ और सुनहरे टेप में लिपटे हुए है रक़म हर एक तोहफ़े पर कोई मानूस नाम रात होगी और डिनर के बा'द मेरे पास सब आ जाएँगे मेरी बीवी मेरे बच्चे मेरे दोस्त मेरी शाख़ों से उतारे जाएँगे तोहफ़े तमाम जागती सोई हुई गुड़िया दमकती धारियों वाला फ़्राक मेरे बेटे के लिए बंदूक़ जिस से वो करेगा उड़ती चिड़ियों का शिकार मेरी बीवी के लिए नेकलेस चमकता पुर-वक़ार और भी तोहफ़े बहुत से बे-शुमार और बच्चों के लिए और अपने प्यारों के लिए जब गुज़र जाएगी शब बट चुकेंगे सारे तोहफ़े बुझ चुकेंगे बल्ब सब मैं ड्राइंग-रूम की बे-कार शय हो जाऊँगा मेरे सूखे ज़र्द-पत्तों की महक जागती-जीती फ़ज़ा में कब तलक फिर मिरी बीवी कहेगी आओ बच्चो घर की ज़ेबाइश नए सिरे से करें फेंक दें अब घर से बाहर ये क्रिसमस का दरख़्त पत्ता पत्ता उस की हर इक शाख़ का मुरझा गया अब नया साल आ गया — Shahzad Ahmad