ये सोच कर कि तेरी जबीं पर न बल पड़ेबस दूर ही से देख लिया और चल पड़ेदिल में फिर इक कसक सी उठी मुद्दतों के बा'दइक उम्र के रुके हुए आँसू निकल पड़े— Shahzad Ahmad