palak band kar aasmaañ dekhta hooñ | पलक बंद कर आसमाँ देखता हूँ

  - Umrez Ali Haider

पलक बंद कर आसमाँ देखता हूँ
खुले आँख फिर मैं जहाँ देखता हूँ

यहाँ फिर वहाँ फिर जहाँ देखता हूँ
कोई राज़ राज़-ए-निहाँ देखता हूँ

जहाँ को जो मैं आसमाँ देखता हूँ
ज़मीं को सो मैं आशियाँ देखता हूँ

जहाँ देखता हूँ निहाँ देखता हूँ
ये मैं क्यूँ यहाँ फिर वहाँ देखता हूँ

नया रंग–ओ–बू मैं अयाँ देखता हूँ
लब-ओ-रुख़ है बदला जहाँ देखता हूँ

मैं भी जलने लगता हूँ शोलों के जैसे
कहीं जब निकलता धुआँ देखता हूँ

जहाँ तक उफ़क़-बे-कराँ देखता हूँ
वहाँ तक मैं अपना मकाँ देखता हूँ

इधर फिर उधर फिर जहाँ देखता हूँ
पस-ए-इश्क़ मैं फिर ज़ियाँ देखता हूँ

जहाँ में 'अजब दिल-सिताँ देखता हूँ
वतन जब ये हिन्दोस्ताँ देखता हूँ

जिसे सर से पा तक निहाँ देखता हूँ
शब-ए-वस्ल हो फिर अयाँ देखता हूँ

है लगता, यहाँ है न पीर-ए-मुग़ाँ अब
मैं हर सू जो तीर-ओ-कमाँ देखता हूँ

हो मुश्किल घड़ी पासबाँ देखता हूँ
ये हर दम किसे मेहरबाँ देखता हूँ

उसी को जहाँ का तहाँ देखता हूँ
सो "हैदर" किसी को कहाँ देखता हूँ

  - Umrez Ali Haider

Dushmani Shayari

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