बूटी लगी है मुरझाने वफ़ा की

गुलशन में है पुकार-ओ-सर सबा की

कब तक चलेंगे जौर-ओ-ज़ुल्म ज़ालिम
होनी है मौत कल तेरे जफ़ा की

किस को है डर तिरे ज़ुल्मों का जाबिर
रंगत उतर चुकी तेरे असा की

अब तक यही अज़ल से है रिवायत
होती है इन्तिहा हर इब्तिदा की

धक्का दिया है बच्चों ने जो मुझ को
आती है याद अपने बचपना की

माँगा करो ख़ुदा से ही हमेशा
मिलनी जो है जज़ा हर इक दुआ की

होता फ़ना है जो कहता अनलहक़
वाहिद सिफ़त जो है मेरे ख़ुदा की

साक़ी मरे कि उजड़े मय-कदा अब
मुझ को है फ़िक्र "हैदर" मय-कदा की

— Umrez Ali Haider

More by Umrez Ali Haider

Other ghazal from the same pen

See all from Umrez Ali Haider →

Promise Shayari

Shers of promise.

All Promise Shayari poetry →

Similar writers

Voices in the same orbit

Browse by mood

Poetry by feeling