meri khwaahish hai ki aangan mein na deewaar uthe | मेरी ख़्वाहिश है कि आँगन में न दीवार उठे

  - Rahat Indori

मेरी ख़्वाहिश है कि आँगन में न दीवार उठे
मेरे भाई मेरे हिस्से की ज़मीं तू रख ले

  - Rahat Indori

Aangan Shayari

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    ओ सखी मन उसका तो तन भी उसी का
    हक़ है उसको ग़ैर ये आँगन न चूमे
    Neeraj Neer
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    तुम्हारे बाद इस आँगन में फूल खिलने पर
    ख़ुशी हुई भी तो ये दुख हुआ कि दें किसको
    Mohit Dixit
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    मेरे आँगन में एक बूढ़ा पेड़
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    वो भी इक दौर था कि सावन में
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    हुआ करती थी मेरी ईद जिसके दीद से साहिल
    उतर आया है देखो चाँद वो ग़ैरों के आँगन में
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    सबब वो पूछ रहे हैं उदास होने का
    मिरा मिज़ाज नहीं बे-लिबास होने का

    नया बहाना है हर पल उदास होने का
    ये फ़ाएदा है तिरे घर के पास होने का

    महकती रात के लम्हो नज़र रखो मुझ पर
    बहाना ढूँड रहा हूँ उदास होने का

    मैं तेरे पास बता किस ग़रज़ से आया हूँ
    सुबूत दे मुझे चेहरा-शनास होने का

    मिरी ग़ज़ल से बना ज़ेहन में कोई तस्वीर
    सबब न पूछ मिरे देवदास होने का

    कहाँ हो आओ मिरी भूली-बिसरी यादो आओ
    ख़ुश-आमदीद है मौसम उदास होने का

    कई दिनों से तबीअ'त मिरी उदास न थी
    यही जवाज़ बहुत है उदास होने का

    मैं अहमियत भी समझता हूँ क़हक़हों की मगर
    मज़ा कुछ अपना अलग है उदास होने का

    मिरे लबों से तबस्सुम मज़ाक़ करने लगा
    मैं लिख रहा था क़सीदा उदास होने का

    पता नहीं ये परिंदे कहाँ से आ पहुँचे
    अभी ज़माना कहाँ था उदास होने का

    मैं कह रहा हूँ कि ऐ दिल इधर-उधर न भटक
    गुज़र न जाए ज़माना उदास होने का
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    Rahat Indori
    मज़ा चखा के ही माना हूँ मैं भी दुनिया को
    समझ रही थी कि ऐसे ही छोड़ दूँगा उसे
    Rahat Indori
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    किसने दस्तक दी ये दिल पर कौन है
    आप तो अंदर हैं बाहर कौन है
    Rahat Indori
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    ज़िंदगी की हर कहानी बे-असर हो जाएगी
    हम न होंगे तो ये दुनिया दर-ब-दर हो जाएगी

    पावँ पत्थर कर के छोड़ेगी अगर रुक जाइए
    चलते रहिए तो ज़मीं भी हम-सफ़र हो जाएगी

    जुगनुओं को साथ ले कर रात रौशन कीजिए
    रास्ता सूरज का देखा तो सहर हो जाएगी

    ज़िंदगी भी काश मेरे साथ रहती उम्र-भर
    ख़ैर अब जैसे भी होनी है बसर हो जाएगी

    तुम ने ख़ुद ही सर चढ़ाई थी सो अब चक्खो मज़ा
    मैं न कहता था कि दुनिया दर्द-ए-सर हो जाएगी

    तल्ख़ियाँ भी लाज़मी हैं ज़िंदगी के वास्ते
    इतना मीठा बन के मत रहिए शकर हो जाएगी
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    Rahat Indori
    हौसले ज़िंदगी के देखते हैं
    चलिए कुछ रोज़ जी के देखते हैं

    नींद पिछली सदी की ज़ख़्मी है
    ख़्वाब अगली सदी के देखते हैं

    रोज़ हम इक अँधेरी धुँद के पार
    क़ाफ़िले रौशनी के देखते हैं

    धूप इतनी कराहती क्यूँ है
    छाँव के ज़ख़्म सी के देखते हैं

    टुकटुकी बाँध ली है आँखों ने
    रास्ते वापसी के देखते हैं

    पानियों से तो प्यास बुझती नहीं
    आइए ज़हर पी के देखते हैं
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    Rahat Indori

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