पुराने घर की यादें क्यूँ न आएँ
    नये घर में कोई आँगन नहीं है
    Saarthi Baidyanath
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    किसे जन्नत मिलेगी या किसे दोज़ख़ मिलेगा
    इसे भी तय ज़मीं पर रहने वाले कर रहे हैं
    Saarthi Baidyanath
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    मुझे तुझसे मोहब्बत हो न जाये
    बुढ़ापे में फ़ज़ीहत हो न जाये

    जो आये हो तो साँसे चल रहीं हैं
    तेरे जाने से दिक़्क़त हो न जाये

    कभी मौका मिले तो हँस लो, गा लो
    कहीं रोने की आदत हो न जाये

    यक़ी टूटा है दिल टूटा नहीं है
    सँभल जाओ कि नफ़रत हो न जाये

    हमारा मूड अब बनने लगा है
    कि ऐसे में शरारत हो न जाये
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    Saarthi Baidyanath
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    कुछ काम-धाम है ही नहीं और क्या करें
    दिन-रात सुब्हो-शाम चलो मशविरा करें
    Saarthi Baidyanath
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    तुझे जीने नहीं देगी ये दुनिया
    ये दुनिया भी कहाँ ख़ुद जी रही है
    Saarthi Baidyanath
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    मैं ख़्वाब-ए-इश्क़ की ता'बीर में हूँ
    अभी मैं वादी-ए-कश्मीर में हूँ
    Saarthi Baidyanath
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    हसीं है फूल सी नाज़ुक कली जैसी
    मेरी बेटी दुआओं की नदी जैसी
    Saarthi Baidyanath
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    चाहे जितनी हो हिमालय की ऊँचाई
    बाप के कंधे से ऊँचा कुछ नहीं है
    Saarthi Baidyanath
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    तेरी सूरत और सीरत यूँ है जैसे
    आइने पर आइना रक्खा हुआ है
    Saarthi Baidyanath
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    तुम्हारा नाम लिखना आ गया है
    मैं अब स्कूल जाकर क्या करूँगा
    Saarthi Baidyanath
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