इन्हीं पिछले दिनों से कुछ मुझे इस बात का ग़म है
अगर मैं रो रहा हूँ तो तिरी क्यूँ आँख पुर-नम है
अगर मैं रो रहा हूँ तो तिरी क्यूँ आँख पुर-नम है
तिरी तस्वीर है ये रात है बारिश है बादल भी
मगर फिर भी न जाने क्यूँ यहाँ कुछ तो अभी कम है
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न बदला है कुछ भी किसी हाल में
वही हैं मसाइल नए साल में
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बरसात क्या है रात भी अर्ज़-ए-हयात भी
चुभने लगी है अब तिरी हर एक बात भी
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कई क़िस्से अधूरे रह गए अपनी कहानी में
चले आए हैं बचपन को गँवा के नौजवानी में
चले आए हैं बचपन को गँवा के नौजवानी में
हवाएँ जो बग़ावत पर उतर आई हैं आख़िर में
किसी तूफ़ान की दस्तक है मेरी ज़िंदगानी में
नई फ़स्लों को ये कुछ और से कुछ और करते हैं
गुलाबों की जो ख़ुशबू ढूँढ़ते है रातरानी में
हमें आ कर बताते हैं उजालों की सभी फ़ितरत
कभी रौशन न हो पाए थे जो अपनी जवानी में
तू हर इक बात पे जो रूठ के जाने को कहता है
तिरा किरदार है बेहद अहम मेरी कहानी में
ये मेरा वक़्त है इस वक़्त की अपनी रवानी है
जगा सकता हूँ अपनी प्यास भी मैं आग-पानी में
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कुछ न कहेंगे हम भी तेरे कहने तक
चुप ही रहेंगे तेरे भी चुप रहने तक
चुप ही रहेंगे तेरे भी चुप रहने तक
तेरे ज़ुल्म सहेंगे चाहे मर जाऍं
उफ़ न करेंगे आँख से दरिया बहने तक
बस्ती बस्ती घू
मेंगे घर ढूॅंढ़ेंगे
रह जाऍंगे शहर में तेरे रहने तक
चाहे जैसा हाल हो अपना क्या ग़म है
प्यार करेंगे तुझ को तेरे कहने तक
ये तेरा शफ़्फ़ाफ़ बदन सब फीके हैं
चाँद सितारे लाली सुरमा गहने तक
तुझ से मिल कर उम्र गँवाऍंगे अपनी
सह लेंगे फिर हिज्र भी तेरा सहने तक
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लड़खड़ाती है क़लम रंगीनियाँ ही क्यूँ लिखूँ
लू से जलता है बदन पुर्वाइयाँ ही क्यूँ लिखूँ
लू से जलता है बदन पुर्वाइयाँ ही क्यूँ लिखूँ
दिख रही हों जब मुझे हैवानियत की बस्तियाँ
तो इन्हें महबूब की शैतानियाँ ही क्यूँ लिखूँ
देख लूँ मैं जब कभी बूढ़ी भिखारन को कहीं
क्यूँ लिखूँ ग़ज़लों में परियाँ रानियाँ ही क्यूँ लिखूँ
फूल से बच्चों के चेहरे भूख से बे-रंग हों
तो बता ऐ दिल मिरे फिर तितलियाँ ही क्यूँ लिखूँ
माँ तिरे चेहरे पे जब से झुर्रियाँ दिखने लगीं
और भी लिखना है कुछ रानाइयाँ ही क्यूँ लिखूँ
क्यूँ लिखूँ ज़ुल्फ़-ओ-लब-ओ-रुख़सार पे नग्में बहुत
प्यार की पहली नज़र रुस्वाइयाँ ही क्यूँ लिखूँ
लिख तो सकता हूँ बहुत सी ख़ुशनुमा ऊँचाइयाँ
फिर ग़मों की ही बहुत गहराइयाँ ही क्यूँ लिखूँ
क्यूँ लिखूँ दोनों तरफ़ दोनों तरफ़ की क्यूँ लिखूँ
रौशनी लिख दूँ मगर परछाइयाँ ही क्यूँ लिखूँ
जंग के मैदान में ये ख़ून या सिन्दूर है
शोर जब भरपूर है शहनाइयाँ ही क्यूँ लिखूँ
पेट की ख़ातिर जो हरदम तोड़ता हो तन बदन
चैन से बैठा नहीं अँगड़ाइयाँ ही क्यूँ लिखूँ
मैं लिखूँ दुनिया के हर इक आदमी की ज़िंदगी
मौत की आमद या फिर बीमारियाँ ही क्यूँ लिखूँ
ये नए लड़के जो सोलह साल के ही हैं अभी
इन की ये मदमस्तियाँ-नादानियाँ ही क्यूँ लिखूँ
ज़िंदगी अपनी अभी तो ज़िंदगी से है जुदा
अब मगर वीरानियाँ-बर्बादियाँ ही क्यूँ लिखूँ
हाँ मिरे बेटे लिखूँगा मैं तुझे मेले बहुत
मैं अकेला ही जिया तन्हाइयाँ ही क्यूँ लिखूँ
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